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नहरी पानी के लिए किसान आंदोलन शुरू आज सिर मुंडवाकर जताएंगे विरोध

Dainik Bhaskar

Feb 02, 2018, 02:15 AM IST

Bundi News - नहरी पानी के लिए बूंदी ब्रांच केनाल के अंतिम छोर के किसान शुक्रवार को विरोध स्वरूप अपना सिर मुंडवाएंगे। गुरुवार...

नहरी पानी के लिए किसान आंदोलन शुरू आज सिर मुंडवाकर जताएंगे विरोध
नहरी पानी के लिए बूंदी ब्रांच केनाल के अंतिम छोर के किसान शुक्रवार को विरोध स्वरूप अपना सिर मुंडवाएंगे। गुरुवार को छापड़दा गणेश मंदिर के बाहर पूजा कर किसानों ने क्रमिक अनशन की शुुरुआत की। पहले दिन 10 किसान क्रमिक अनशन पर बैठे, जिनमें दो महिलाएं भी शामिल हैं। नहरी पानी को लेकर शुरू हुए इस आंदोलन में यह पहला मौका है, जब पुरुष किसानों के साथ महिला किसान भी अपनी भागीदारी निभा रही हैं।

इससे पहले धरना स्थल के समीप प्रशासन व सीएडी अधिकारियों की सद्बुद्धि के लिए किसानों ने यज्ञ किया। विधि विधान से मंत्रोच्चारण के साथ यज्ञ की शुरुआत हुई। पंचायत समिति सदस्य महेंद्र डोई, सरपंच विमला डोई, पूर्व सरपंच महावीर सीनम, रामेश्वर धाबाई, रामचरण शर्मा,चेतराम मीणा, पूर्व उप सरपंच तुलसीराम शर्मा, भाजपा इकाई अध्यक्ष विष्णुप्रसाद शर्मा ने मंत्रोच्चारण के साथ हवन में आहुतियां दी। साथ ही भगवान से प्रार्थना की कि वे किसानों की पीड़ा समझने के लिए प्रशासन व सीएडी अधिकारियों को सद्बुद्धि दे।

बूंदी. अनशन स्थल पर सीएडी व प्रशासनिक अधिकारियों को सद्बुद्धि के लिए यज्ञ करते किसान।

क्रमिक अनशन पर ये 10 किसान बैठे पहले दिन

पहले दिन क्रमिक अनशन पर 10 किसान बैठे है। इनमें वार्ड पंच किशनलाल माली, गौरीशंकर मीणा, भंवरलाल कहार, सुरेश शर्मा, कन्या बाई, पुष्पा बाई, रामकुंवार बैरवा, शंकरलाल गुर्जर, बलवीर गुर्जर, जगदीश माली शामिल थे। किसानों का कहना था कि आज पहला दिन है शुक्रवार से क्रमिक अनशन बैठने वालों की संख्या बढेग़ी।

आश्वासन नहीं हमें पानी चाहिए: डोई

धरनास्थल पर किसानों को संबोधित करते हुए पंचायत समिति सदस्य महेंद्र डोई ने कहा कि हमने हमारी पीड़ा सबको बताई है। छोटे से लेकर बड़े अधिकारियों तक अपनी फरियाद पहुंचाई, लेकिन कोरे आश्वासन मिले है। किसानों को आश्वासन नहीं नहरी पानी चाहिए। बाद में सीएडी प्रशासन टेल पर पानी पहुंचाता है तो उसका किसानों को कोई लाभ नहीं मिलना। फसलों को जीवित रहने के लिए अभी पानी की अावश्यकता है। किसान आंदोलन के लिए मजबूर हुआ है। किसानों की आजीविका फसलों पर निर्भर करती है। जब यही नहीं रहेगी तो उनके सामने भूखों मरने की नौबत आएगी।

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