विकास के नाम पर 4 करोड़ खर्च, पार्क दुर्दशा के शिकार

Bundi News - लाखेरी| पार्क शहर के विकास का आइना होते हैं। जिनको देखकर लोगों को लगता है कि शहर की स्थानीय सरकार शहरवासियों के लिए...

Dec 04, 2019, 10:55 AM IST
lakheri News - rajasthan news 4 crore spent in the name of development victims of park plight
लाखेरी| पार्क शहर के विकास का आइना होते हैं। जिनको देखकर लोगों को लगता है कि शहर की स्थानीय सरकार शहरवासियों के लिए कितनी समर्पित है, लेकिन शहर के पार्को की दुर्दशा को देखकर नहीं लगता कि पालिका इस दिशा में गंभीर है। पिछले 15 वर्षो से शहर के पार्को में कोई खास बदलाव नहीं आया है। बस केवल धीरे-धीरे पार्को की हरियाली व फुलवारी गायब होती जा रही है। इसका दुख शहर के प्रकृति प्रेमियों को हो सकता है, लेकिन पालिका को नहीं। हालत यह है कि सबसे बडे़ सुखाड़िया पार्क में फुलवारी नजर नहीं आती जबकि एक ग्रीन ब्लाॅक में तो कबाड़ के साथ बड़ी संख्या में ट्री गार्ड पडे़ है। यही हालत सबसे पुराने स्वामी विवेकानंद पार्क की है। अंबेडकर पार्क हरियाली के लिहाज से ठीक है, लेकिन मनोरंजन के संसाधन नहीं है। लोगों को पार्को के भ्रमण करते समय इनकी दुर्दशा देखकर खींझ होती है। वे विकास के नाम पर बेतहाशा खर्च किए जा रहे। बजट की उपयोगिता पर सवालिया निशान लगाते है।

15 वर्षो पहले तत्कालीन ईओ जेपी शर्मा के समय पार्को-मनोरंजन साधन-आकर्षक फुलवारी विकसित की गई थी। अब पार्को की हरियाली को देख सैलानी मंत्रमुग्ध हो जाते थे। धीरे-धीरे पालिका का ध्यान पार्क की ओर से कम हो गया ओर विकास के नाम पर केवल वार्डो में कंक्रीट के काम कराने तक सिमट गया। पार्क दयनीय स्थिति में आ गए। पार्को में फुलवारी के बजाए फूलों के पौधे दिखाई देते हैं या फिर कुछ छोटे-छोटे फैशनेबल पौधे है। इसके चलते लोगों की आवाजाही भी कम होने लगी है।

लाखेरी। सुखाडिया पार्क में टूटे झूले व अन्य संसाधन।

मनोरंजन के साधन टूटे: पार्क में कई वर्षो पहले ये साधन लगे थे, लेकिन इनमें से अधिकांश जर्जर हो कर टूट चुके हैं। कुछ पार्क में तो मनोरंजन के साधन ही नहीं है। सुखाड़िया पार्क में एक झूले के अलावा ऐसे कोई मनोरंजन के साधन नहीं है। जिसके चलते बच्चे अपना समय व्यतीत करें। यही हालत शहर के अन्य पार्को की है। पालिका ने कथित विकास के नाम पर शहर में चाल करोड़ खर्च कर दिए, लेकिन वास्तविक रूप से लाभ लोगों को नहीं मिल पाया है। मसलन बस स्टाॅप पर लोगों के लिए मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। पार्को में बच्चों सैलानियों को सुविधा नहीं मिल रही है। खेलों के विकास के लिए स्थानीय सरकार गंभीर नहीं है, तो सवाल उठता है कि इतनी बड़ी धन राशि खर्च करने का औचित्य क्या रहा।

पांच साल से उठा रहे है समस्या: पार्को को लोगों के लिए सुविधाजनक बनाने की मांग कोई नई नहीं है। पिछले पांच सालों से क्षेत्रीय पार्षद सहित अन्य जनप्रतिनिधि इस समस्या को लगातार उठाते आ रहे है, लेकिन पालिका प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं दे पा रहा है। यह मसला कई बार बोर्ड की बैठक में भी उठा, लेकिन आश्वासनों के सिवाए कुछ नहीं हुआ। पार्षद ललिता सैनी पार्को की दुर्दशा को लेकर लगातार पालिका प्रशासन को अवगत कराती रही है। हर बार केवल सुधार करने के आश्वासन मिलते रहे। पार्षद विनोद बैरवा, राजेश तंवर बताते है कि बोर्ड की बैठक में शहर के पार्को का मसला उठाया, लेकिन पालिका प्रशासन इसके लिए गंभीर ही नहीं है।

चार पार्को में से एक पार्क में झूला: शहर में 4 पार्क हैं। जिनमें से केवल सुखाडिया पार्क में ही एकमात्र झूला है। वहीं भी आए दिन टूटता रहता है। किसी भी पार्क में झूला एक सामान्य रूप से मनोरंजन का साधन माना जाता है। जिसके माध्यम से बच्चे अपना मनोरंजन करते है। आधुनिक रूप से शहर का एक भी पार्क ऐसा नहीं है। जिसमें बच्चों के लिए नवीनतम मनोरंजन के साधन विकसित हुए हो। सुखाडिया पार्क का यह आलम है कि यहां पार्क के एक ब्लाक में तो पालिका ने केवल कबाड़ जमा कर रखा है। वहीं साथ में नए ट्री-गार्ड को यहां पर एकत्र कर रखा है। इसके चलते पार्क का एक हिस्सा इनसे अटा पड़ा है। पार्क में प्रवेश करते ही लोगों का ध्यान इनमें पर पड़ते है। नकारात्मक संदेश जाता है। यह समस्या एक साल से चली आ रही है, लेकिन स्थानीय पार्षदों सहित समाज के अन्य लोगों ने अवगत कराया।


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