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सीएम का जिस पर ज्यादा फाेकस उसी जांच काउंटर पर फिर से ताले
चिकित्सा विभाग के निर्देशों के अनुसार कोराना की रोकथाम के लिए हाथ धोना भी एक प्रभावी उपाय है, पर जिला अस्पताल के डॉक्टरों के अधिकांश चैंबर्स में सैनेटाइजर्स, मास्क, ग्लव्स तो दूर, रनिंग वाटर तक की सुविधा नहीं। ऐसे में वे अपने हाथों से एक रोगी का परीक्षण करने के बाद बगैर हाथ धोए या सैनेटाइजर को काम लिए दूसरे मरीजों की जांच कर रहे हैं। जिला अस्पताल का हर डाॅक्टर रोज 80 से 100 मरीजों की जांच करता है। ऐसे में यदि कोई कोराना का संभावित रोगी डॉक्टर के हाथों में वायरस छोड़ गया तो बाकी रोगियों के भी कोरोना संक्रमित होने का खतरा बढ़ जाएगा। भास्कर रिपोर्टर ने डॉक्टर्स के चेंबर्स, नर्सिंग स्टेशन, ड्यूटी रूम काे जांचा तो यह हकीकत सामने आई।
नॉर्मल मास्क लगाकर ही मरीज देखते हैं डाॅक्टर
नाम नहीं बताने की शर्त पर अस्पताल के डॉक्टराें-स्टाफ ने भी माना कि वे खुद भी कोरोना से सुरक्षित नहीं है। उनके पास एन-95 मास्क तक नहीं है। नॉर्मल मास्क लगाकर ही मरीज देखते हैं। अस्पताल प्रशासन ध्यान नहीं दे रहा। वायरस से बचाव में स्प्रिट से ज्यादा कारगर सैनेटाइजर है, पर अस्पताल में सैनेटाइजर नहीं है। अस्पताल प्रशासन ने एन-95 मास्क ही नहीं मंगवाए तो सैनेटाइजर तो दूर की बात है। वे खुद ही बाजार से साधारण मास्क खरीदकर काम चला रहे हैं, 50 से 100 रुपए के मास्क के 600 रुपए चुकाकर ला रहे हैं।
दर्द में इधर से उधर भटकती हैं महिलाएं
{डाबला की हंसाबाई को चौथा महीना चल रहा है। लेडी डॉक्टर ने दवा लिखने से पहले जांच लिखी। हंसाबाई जनाना अस्पताल के जांच केंद्र पहुंची पर वहां ताला लगा था। वह जांच केंद्र ढूंढ़ने के लिए इधर-उधर भटकती रही। बड़ी मुश्किल से जिला अस्पताल में जांच केंद्र पर पहुंची, जहां पहले से लंबी कतारें लगी थी। करीब आधे घंटे बाद नंबर आया।
एडवाइजरी की अस्पताल में ही पालना नहीं
बूंदी में कोरोना का कोई केस सामने नहीं आया पर गारंटी भी नहीं है कि आगे भी नहीं आएगा। नवजात बच्चों, प्रसूताओं, गर्भवती महिलाओं को आम मरीजों के साथ डॉक्टरों को दिखाने, जांच कराने के लिए लाइन में खड़े रहना पड़ता है। दरअसल जिला अस्पताल की जनाना विंग (मातृ एवं शिशु इकाई) के निशुल्क जांच केंद्र पर ताले लगने से इन्हें जिला अस्पताल में जाकर जांच करानी पड़ती है। बाकी मरीजों के साथ ही उन्हें खड़े रहना पड़ता है। ऐसे में संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है। सरकारी एडवाइजरी में यह साफ है कि खांसी, जुकाम, बुखार व सांस के मरीजों से कम से कम एक मीटर की दूरी जरूर हो, पर अस्पताल में जांच काउंटर पर हर तरह के मरीजों के साथ ही गर्भवती, नवजात भी शामिल होते हैं। सोनोग्राफी, एक्स-रे, मेडिकल वार्ड व सर्जिकल वार्ड में भर्ती होने वाले मरीजों की रसीदें भी यहीं कटती हैं। कई बार तो मरीजों की संख्या ज्यादा होने के बाद भीड़ बहुत ज्यादा हो जाती है।
अस्पताल प्रशासन से अपेक्षा की जाती है कि वह कोरोना वायरस से बचाव के लिए जारी एडवाइजरी काे पूरी तरह फॉलो करें, लापरवाही या जरूरी सुविधाओं की कमी है तो दुरुस्त करें।
मुरलीधर प्रतिहार, कलेक्टर (कार्यवाहक)
भास्कर न्यूज|बूंदी
जिला अस्पताल में राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री निशुल्क जांच योजना का बुरा हश्र है। कहने को जिला अस्पताल में तीन-तीन निशुल्क जांच केंद्र हैं ताकि रोगियों को नहीं भटकना पड़े और आसानी से जांच हो, पर यहां जनाना अस्पताल का निशुल्क जांच काउंटर दो माह से बंद पड़ा है। ऐसे में नवजातों-प्रसूताओं को जिला अस्पताल में ले जाकर बाकी मरीजों के साथ लाइन में खड़े होकर जांच करानी पड़ती है। इससे संक्रमण का खतरा काफी बढ़ जाता है। जनाना से जिला अस्पताल में रोज 30-40 गर्भवती महिलाएं, 8 से 10 नवजात जांच के लिए भेजे जाते हैं, 5-7 दूसरे बच्चों की भी जांच होती है। दैनिक भास्कर के 7 जनवरी के अंक में सब कुछ ओके नहीं है सरकार...शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी, जिसके बाद अस्पताल प्रशासन ने अगले दिन जांच केंद्र का ताला खुलवाया, पर एक-दो दिन बाद ही फिर ताला जड़ दिया गया। अस्पताल प्रशासन इसके पीछे स्टाफ की कमी बता देता है।
निशुल्क जांच योजना की हकीकत
मुख्यमंत्री गहलोत ने मार्च-2013 में निशुल्क जांच योजना शुरू की थी। इसके लिए जिला अस्पताल में भी कीमती जांच मशीनें आई। तीन अलग-अलग जांच केंद्र बनाए गए, अतिरिक्त स्टाफ भी संविदा पर लगाया गया। वर्ष 2013 से पहले 6 कर्मचारी जननी सुरक्षा योजना के तहत जांच केंद्र में थे, आठ लैब टेक्नीशियन को संविदा पर लगाया गया। तब 14 लैब टेक्नीशियन, तीन सीनियर लैब टेक्नीशियन सेवाएं दे रहे थे। आज 9 एलटी-2 सीनियर एलटी रह गए। नतीजा, जनाना अस्पताल के जांच केंद्र के ताले नहीं खुल रहे। ब्लड बैंक में 7 सीनियर लैब टेक्नीशियन हैं, इनमें से कुछ को निशुल्क जांच योजना शुरू होने के बाद दूसरी जगह से ट्रांसफर कर लगाया गया था, पर ज्यादातर ने तिकड़म कर ब्लड बैंक में ही ड्यूटी लगवा ली। इनका पेमेंट निशुल्क जांच योजना से होता है।
डॉक्टराें के पास सैनेटाइजर-ग्लव्स तो दूर, हाथ धाेने का पानी भी नहीं
जमीन पर लेटकर ऑपरेशन का इंतजार
{नैनवां रोड की रुक्मणि की देवरानी के नवजात की पैदा होने के कुछ वक्त बाद ही तबीयत बिगड़ गई। डॉक्टर ने जांच लिख दी। रुक्मणि 12 घंटे के नवजात को लेकर 25 मिनट तक सामान्य अस्पताल के जांच केंद्र पर बाकी मरीजों के साथ लाइन में लगी रही।
{महावीर कॉलोनी की नफीसा का बेटा 4 दिन से खांसी, जुकाम, बुखार से पीड़ित है। डॉक्टर ने जांच लिखी, जनाना अस्पताल के जांच केंद्र पर ताला मिला, जिला अस्पताल के जांच केंद्र पर पहुंची तो भीड़ मिली।
ट्राेमा सेंटर : नर्सिंग स्टाफ बिना मास्क के रोगियों की मरहम-पट्टी करते मिला। बच्चे की जांच कर रहे डॉक्टराें के पास न सैनेटाइजर है, न स्प्रीट। डॉक्टर एक के बाद एक रोगी की जांच कर रहे, पर एन-95 मास्क भी नहीं है। वे खुद खतरा झेल रहे हैं। ट्रोमा सेंटर में इमरजेंसी अाैर अन्य बीमारियों के रोगी भी आते हैं। चिकित्सा स्टाफ का कहना है कि अफसराें काे कई बार मास्क के लिए कह चुके, पर कुछ नहीं हुअा।
आउटडोर : आउटडोर में रोज 500-600 रोगी आते हैं, इनमें काफी खांसी-जुकाम, बुखार के रोगी होते हैं। हर डॉक्टर करीब 100 मरीज देखता है। उनके पास सैनेटाइजर तो दूर हाथ धोने का पानी भी नहीं है। वे बिना हाथ साफ किए मरीज देखते रहते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि हर मरीज को देखने के बाद हाथ धोना तो संभव नहीं, इतना वक्त भी नहीं मिलता। उन्होंने माना कि कोरोना से बचाव के लिए उनके पास कोई साधन नहीं हैं।
निशुल्क जांच केंद्र : स्टाफ के पास मास्क-सैनेटाइजर-ग्लवज नहीं हैं। जनाना अस्पताल का निशुल्क जांच केंद्र बंद होने से प्रसूताओं-नवजाताें की जांच भी यहीं बाकी मरीजों के साथ ही होती है। स्टाफ का कहना है कि अस्पताल प्रशासन ने सैनेटाइजर या बचाव के कोई साधन नहीं दिए। बड़ी संख्या में हर तरह के रोगों से पीड़ितों की जांच करते है, हां स्प्रिट से हाथ जरूर साफ कर लेते हैं।
_photocaption_राजीव गांधी कॉलोनी के वसीम के हाथ में फ्रैक्चर है। 8 दिन से ऑपरेशन के लिए परिजन अस्पताल में चक्कर लगा रहे हैं। सर्जिकल वार्ड में आज जब ऑपरेशन के लिए लाया गया। जमीन पर लेटकर ऑपरेशन की बारी का इंतजार करना पड़ा। वसीम की नानी जन्नत ने बताया कि यहां भी प्राइवेट दवाएं लिखी गई, ऑपरेशन के लिए रॉड भी हमसे ही मंगवाई गई। करीब 600 रुपए में बाजार से रॉड खरीदी, पास में इतने पैसे नहीं थे, ऐसे में अस्पताल में आए लोगों से मदद लेनी पड़ी। *photocaption*
कोराेना से बचाने वाला स्वास्थ्य विभाग केवल हिदायतें देने में ही व्यस्त
ड्यूटी के लिए नॉर्मल मास्क, जिससे बचाव भी संभव नहीं।