शबरी का वात्सल्य भाव भगवान को वन में खींच लाया: पं. पुनीत

Bundi News - शहर के अग्रवाल धर्मशाला में चल रही भागवत कथा में शनिवार को कथावाचक पं. पुनीत शर्मा ने कहा कि यह माता शबरी का ही...

Bhaskar News Network

Jul 14, 2019, 09:40 AM IST
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शहर के अग्रवाल धर्मशाला में चल रही भागवत कथा में शनिवार को कथावाचक पं. पुनीत शर्मा ने कहा कि यह माता शबरी का ही वात्सल्य भाव था कि भगवान राम को वनों की ओर खींच लाया।

यूं तो भगवान राम के वनवास के कई कारण माने जाते हैं, लेकिन इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात शबरी की वह कठोर अनवरत साधना थी जिसमे वह वर्षो अपने मन में भगवान राम के लिए वात्सल्य समेटे थी। भगवान राम व शबरी का मिलन एक पुत्र व मा के अगाध प्रेम का प्रतीक है। उन्होंने कहा दृष्टांत घने वनों मे भाव विभोर कर देने वाले एक लंबे इंतजार का है, जिसमें शबरी रोजाना राम के आने का इंतजार करती ओर अपनी कुटिया को सजाती संवारती।यह उनके वात्सल्य का ही प्रमाण है, जो मां अपने पुत्र के आगमन मे इतनी व्याकुल नजर आती है। हमारे धर्मग्रंथों में ऐसे उदाहरण समाज में एक मिसाल है, जो वर्षो से सबको समान दृष्टि से देखने समझने की शिक्षा देते हैं। इस दौरान भगवान राम के जन्म व विवाह प्रसंग की प्रस्तुति दी गई। इसमें शहर सहित बड़ाखेड़ा अाैर अासपास के गांवों के श्रद्धालु मौजूद रहे।

कृष्ण जन्म पर झूमे श्रद्धालु: शनिवार को भागवत कथा के आखिरी चरण में भगवान कृष्ण के जन्म पर झूमे उठे ओर जय कन्हैयालाल के जयकारे लगने लगे। भगवान कृष्ण के जन्म प्रसंग से भक्तों में उल्लास छा गया। इस दौरान कृष्ण काे पालकी में ले जाते हुए वासुदेव की मनमोहक झांकी सजाई गई। कृष्ण जन्म पर महिलाएं भाव विभोर हो गई।

लाखेरी. अग्रवाल धर्मशाला मे भागवत कथा में सजाई झांकी।

लाखेरी. कथा में कृष्ण जन्मोत्सव।

भगवान वामन की झांकी सजाई

भागवतजी में भगवान वामन के अवतार की कथा में बताया कि भगवान ने तीन पग में पूरे ब्रह्मांड को नाप कर जब राजा बली के सिर पर पग रखा तो वे कृतार्थ हो गए। यह भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा का ऐसा भाव है ,जो भक्त- भगवान को एक कर देता है। इस दौरान भगवान व शुक्राचार्य की कथा में कहा कि मनुष्य के दो आंखें ज्ञान ओर वैराग्य की प्रतीक होती है। शुक्राचार्य की आंख की दृष्टि इसलिए विलोपित हो गई कि वे ज्ञान से परिपूर्ण रहे लेकिन जब वैराग्य का समय आया तो अहंकार में आ गए। तब भगवान वामन ने कहा कि संत अाैर ऋषियों की दृष्टि में सब समान होते हैं। जिस तरह भगवान भक्तों से भेदभाव नहीं करते, वैसे ही संत सभी को समान रूप से धर्म का दर्शन करवाते हैं।

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