- Hindi News
- National
- Nanwan News Rajasthan News The Changing Colors Of Holi Burning Of Effigies In Place Of Wood
होली के बदलते रंग...लकड़ियों की जगह अब होने लगा पुतलों का दहन
लाखेरी| शहर में समय के साथ होली मनाने के ढंग बदलने लगे। अब होलिका के पुतलों के दहन की परंपरा शुरू हो चुकी है। सबसे पहले नयापुरा में 25 वर्ष पहले होलिका का पुतला तैयार कर दहन किया गया। अब यह परंपरा जारी है। एक समय था, जब होली दहन से एक माह पहले जंगल से खेजड़ी के पेड़ को काट कर होली के डांडा लगाया जाता था। उसे होली के रूप मे जलाया जाता था। लाखेरी और छत्रपुरा में होलिका के पुतले जलेंगे।
होलिका के पुतले में बांस से ढांचा तैयार किया जाता है और कागज की रद्दी से आकार दिया जाता है। मिट्टी से उसे होलिका (महिला) के रूप में तराशा जाता है। 30 वर्ष पहले नयापुरा में गणेश महोत्सव में स्थानीय कलाकर बाबूलाल महावर ने गणेश प्रतिमा की रचना की तभी से यह सिलसिला शुरू हुआ।
नैनवां में आठ दशक से हो रहा हडूडा कार्यक्रम
नैनवां| शहर में धुलेंडी के दिन शाम को लोकानुरंजन हडूडा का आयोजन आठ दशक से चला आ रहा है। यह बाजार के मध्य झंडे की गली पर होता है। झंडे की गली का उतर दिशा का इलाका नायक मालदेव और दक्षिण दिशा का इलाका नायिका मालदेवनी का होता है। लोग रंग-गुलाल से होली खेलते हैं और फिर नहा-धोकर अच्छे कपड़े पहनकर शाम को हडूडे के आयोजन में शामिल होते हैं। शाम को मालदेव चौक से मालदेव और मालदेवणी चौक से मालदेवणी की बाराते गाजे-बाजे के साथ रवाना होकर झंडे की गली पर पहुंचती है। पुलिस और शहर के लोग बीच बचाव कर दोनों बारातों को अपने-अपने पाले में रवाना करवा देते हैं।
लाखेरी. शहर में बनाए गए इन होलिका के पुतलों का होगा दहन।