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पुरातत्व में देश में सबसे संपन्न, फिर भी हमारी बूंदी का म्यूजियम सबसे छोटा

Bhaskar News Network

May 18, 2019, 07:36 AM IST

Bundi News - पुरा संपदा में देश-प्रदेश में सबसे ज्यादा संपन्न होने के बावजूद बूंदी का म्यूजियम सबसे छोटा हाेना हैरत की बात है,...

Bundi News - rajasthan news the most prosperous in the country in archeology yet our bundi museum is the smallest
पुरा संपदा में देश-प्रदेश में सबसे ज्यादा संपन्न होने के बावजूद बूंदी का म्यूजियम सबसे छोटा हाेना हैरत की बात है, जबकि यहां प्रदेश का सबसे बड़ा म्यूजियम होना चाहिए। म्यूजियम के नाम पर यहां मंदिर की परिक्रमा जितनी सी गैलेरी है, जिसमें डिस्पले की गुंजाइश नहीं है।

यह म्यूजियम भी बड़ी कोशिशों के बाद तीन साल पहले शुरू हो सका। स्टोर रूम नहीं है। शोधार्थियों के लिए भी कोई स्पेस नहीं है। पांच मिनट में देखकर टूरिस्ट फ्री हो जाते हैं। यहां जरूरी सुरक्षा बंदोबस्त नहीं, गार्डन विकसित नहीं, चेयर्स की कमी, 84 खंभों की छतरी में महिला-पुरुष टॉयलेट-चौकीदार कक्ष भी नहीं, म्यूजियम में रंगाई-पुताई की जरूरत है। स्टाफ की कमी है, म्यूजियम सहित शहर की 84 खंभों की छतरी, रानीजी की बावड़ी तीनों के लिए 7 ही कर्मचारी हैं। झालावाड़-कोटा के म्यूजियम बहुत बड़े हैं, जबकि यह उनसे ज्यादा रिच है। बूंदी में चंबल की सहायक नदियों का जाल बिछा होने के कारण ही मानव सभ्यताएं पनपी। यहां जंगल, जंगली जानवर, पठार, पानी, खुले मैदान, उपजाऊ मिट्‌टी है, जो प्रागैतिहासिक काल से इतिहासकाल की मानव सभ्यता के लिए उपयुक्त थी।

म्यूजियम में डिस्पले...35 प्रतिमाएं, 36 पेंटिंग्स, 101 हथियार, 95 पत्थर औजार, 03 ताम्रकालीन औजार

बूंदी. सुखमहल स्थित संग्रहालय में रखी प्राचीन मूर्तियां।

9वीं-10वीं शताब्दी की अधगढ़ मूर्तियां माैजूद

पुरान्वेषक ओमप्रकाश कुक्की बताते हैं कि बूंदी में प्रारंभिक पाषाणकाल, मध्य पाषाणकाल, उत्तर पाषाणकाल, ताम्रयुग, लोहयुग, जनपद, मौर्य, शुंग, कुषाण, गुप्तकालीन सभ्यताओं से लेकर ब्रिटिशकाल तक के प्रमाण बिखरे पड़े हैं। सबसे ज्यादा शैलचित्र, शुतुरमुर्ग के अंडे, 5वीं से 14वीं शताब्दी के दर्जनों मंदिर हैं। हर काल की कलाएं हैं। कमलेश्वर में 9वीं-10वीं शताब्दी की अधगढ़ मूर्तियां और पूरी वर्कशॉप, गुप्तकाल का सफेद सैंड स्टोन से निर्मित 5 फुट ऊंचा एकमुखी दुर्लभ शिवलिंग भीमलत क्षेत्र में जंगल में पड़ा है। 10 साल पहले यह साबुत था, समाजकंटकों ने खोदकर बाहर फेंक दिया, दो टुकड़े हो गए। ऐसे ही दो एकमुखी शिवलिंग चंबल-मेज नदी के संगमस्थल पाली गांव में मौजूद हैं। बीजमाता मंडावरा के पास बड़ी संख्या में एक हजार साल से पुरानी मूर्तियां खुले में पड़ी है, जो तस्करों-समाजकंटकों से बची हुई है।

दूसरी जगह सौंपी पुरातत्व सामग्री

कुक्की देश के 15 से ज्यादा बार संग्रहालयों और यूनिवर्सिटियों को निशुल्क पुरा सामग्री भेंट कर चुके हैं, जिनमें ताम्र सभ्यता के अवशेष जैसे मिट्‌टी के खिलौने, मौर्यकाल, अन्य काल के ताम्र सिक्के, पॉट्री, मणके, पाषाणकालीन औजार जैसे हैंडेक्स, स्क्रेपर, चोपर, क्लिवर, कोर (फ्लेेक) शामिल हैं।

रेड स्टोन की भी प्रतिमाएं

म्यूजियम में 9वीं से 12वीं शताब्दी के बीच की रेड स्टोन की प्रतिमाएं हैं, जो हाड़ौती से खासकर बारां, बूंदी जिले में मिली हैं। इनमें गणेश, शिव, विष्णु और जनजीवन से जुड़ी प्रतिमाएं शामिल हैं। हाड़ौती प्रदेश में उस दौर में मंदिर और मूर्तिकला में सर्वाधिक संपन्न क्षेत्र था। उस दौर की शिल्पकला, स्थापत्य कमाल का था।

बूंदी शैली की पेंटिंग्स

16वीं-17वीं शताब्दी की रियासतकालीन पेंटिंग्स नेशनल म्यूजियम में प्रदर्शित बूंदी के चित्रकारों की है, यहां उनकी प्रतिकृतियां प्रदर्शित है। ये पेंटिंग्स रसिक प्रियाग्रंथ पर आधारित है, जिनमें श्रीकृष्ण-राधा की लीलाएं दर्शाई गई हैं।


लाखेरी क्षेत्र में 4 बातें म्यूजियम की कल्पना को देती है बल

लाखेरी| पिछले कुछ सालों में लाखेरी क्षेत्र की पुरा संपदाओं के उजागर होने पर लोगों का ध्यान गया, जिनको संरक्षण की दरकार है। क्षेत्र में स्थापत्य कला के बेजोड़ उदाहरण इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। आदि मानव से संबंधित टूल अाैर शुतुरमुर्ग के अंडे के छिलके इस क्षेत्र को प्राचीनतम की श्रेणी में रखते हैं। ऐसे में क्षेत्र में एक साइट म्यूजियम में इन प्राचीन धरोहरों को संरक्षित करने की ज़रूरत हैं। इसके अतिरिक्त उतराना का एक हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन किला अपनी बनावट के लिए विशिष्ट नजर आता है। केवल पत्थरों से बने यह किला दुर्लभ माना जाता है। पाली गांव में मिलने एकमुखी दो शिवलिंग इस क्षेत्र को प्राचीनता की मजबूत बनाते हैं। साइट म्यूजियम के लिए चार बातें विशेष हैं। जिसके चलते यहां एक अदद म्यूजियम की कल्पना को साकार किया जा सकता है।

1. जीवंत स्टोन वर्कशाॅप

सबसे महत्वपूर्ण बात क्षेत्र में जीवंत स्टोन वर्कशाॅप का होना है। जिसे आर्क लॉजिकल आॅफ इंडिया ने देश की दुर्लभ स्टोन वर्कशाॅप माना है। यह वर्कशाॅप कमलेश्वर महादेव मंदिर क्षेत्र में है। यहां 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच मंदिर की कलात्मक प्रतिमाएं तैयार करने के चिन्ह मौजूद है। यहां शिलाखंडों को बड़ी बारीकी से तराशा गया। इन शिलाओं को प्रतिमा बनाने की तकनीक शिलाखंडों पर नजर आती है। यहां अधगढ़ प्रतिमाएं स्टोन वर्कशाॅप के वजूद को दर्शाती है।

2. प्रतिमाओं की कलात्मकता

मंदिरों पर कलात्मक प्रतिमाएं म्यूजियम की विचारधारा को मजबूती देती है। कमलेश्वर मंदिर क्षेत्र में बिखरी पड़ी प्रतिमाअाें को संरक्षण की दरकार है। म्यूजियम बनने पर इनका संरक्षण संभव होगा, वर्ना कलात्मक प्रतिमाएं जमींदोज हो जाएगी।

3. आदि मानव की मौजूदगी के निशान

क्षेत्र में आदि मानव की मौजूदगी के काफी निशान मिल चुके। इसमें आदि मानव द्वारा प्रयोग में लिए पत्थर के औजार सहित शुतुरमुर्ग के अंडे के छिलके मिलना शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है। इन दिनों राज्य-राष्ट्रीय स्तर से शोधार्थी इस क्षेत्र में आने लगे हैं।

4. टाइगर कॉरिडोर की ओर अग्रसर

लाखेरी क्षेत्र में टाइगर रिजर्व एरिया के विस्तार के रूप में कॉरिडोर बनाने की पहल क्षेत्र के प्रति उत्साहित व आकर्षित करने लगी है। यहां इन दिनों टाइगर की मूवमेंट ने लोगों का ध्यान खींचा है।


लाखेरी। स्टोन वर्कशाॅप के बिखरे प्राचीन अवशेष।

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