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फौजी अौर शिक्षक से ज्यादा वेतन डॉक्टर को, अपनी जिम्मेदारी समझो, नहीं तो नतीजे भुगतोगे-कलेक्टर

3 वर्ष पहले
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जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक में कलेक्टर रुक्मणी रियार ने डॉक्टरों से खूब सवाल किए।

बायोमीट्रिक हाजिरी से ही बनेगी सैलेरी
कलेक्टर ने स्वाइन फ्लू के बढ़ते प्रकोप पर कहा कि जिले में दो मौत हो चुकी है, कई बीमार हैं, पल्स पोलियो के साथ ही स्वाइन फ्लू की भी घर-घर स्क्रीनिंग करवाई जाए। सीएमएचओ गोकुल मीणा ने बताया कि अब बायोमेट्रिक हाजिरी से ही चिकित्साकर्मियों की सैलरी बनेगी।

कलेक्टर की नाराजगी के बाद जिला अस्पताल के पीएमओ बदले
डॉ. ओपी वर्मा की जगह अब जिला अस्पताल के नए पीएमओ डॉ. केसी मीणा होंगे। डॉ. मीणा के पास भामाशाह और जनाना अस्पताल का चार्ज था। डॉ. वर्मा ने बताया कि उनकी माताजी को ब्रेन हेमरेज हो गया था, सात-आठ दिन पहले उन्होंने पदमुक्ति के लिए अर्जी लगाई थी। अस्पताल में आरएमआरएस की बैठक में इस पर भी चर्चा हुई। बताया गया कि कलेक्टर पीएमओ से नाराज थीं। इसके चलते वे बैठक भी अधूरी छोड़कर आ गई थी। नाराजगी की वजह पिछली बैठक में दिए गए निर्देशों की पालना नहीं होना रहा है।

150 से ज्यादा दवाओं की सप्लाई नहीं, इनमें 15 से 20 तो जीवन रक्षक
कलेक्टर ने अधिकारियों से पूछा कि निशुल्क दवा में कितनी शॉर्टेज है तो जवाब मिला कि कई दवाएं सप्लाई नहीं हो रही। मुख्यमंत्री की इच्छा है कि मरीज अस्पताल में आने के बाद बाहर की दवा ना खरीदें, लेकिन दवा की रेगुलर सप्लाई नहीं होने से लोगों को परेशानी हो रही है। यहां तक कि पेरासिटामोल तक अस्पतालों में नहीं है। इस पर निशुल्क दवा प्रभारी डॉ. महेंद्र चौहान ने बताया कि दवाएं आरएमएस से सप्लाई नहीं हो रही। इसके लिए सरकार ने अलग से नियम बना रखा है। किसी अस्पताल को दवा नहीं मिल रही तो वह बाजार से टेंडर के जरिए खरीद सकता है। अभी करीब 150 प्रकार की दवाएं नहीं आ रही, जिनमें 15 से 20 तो बहुत महत्वपूर्ण दवाएं हैं, जो शॉर्ट चल रही हैं। इसे भी कलेक्टर ने गंभीर माना और बीसीएमओ से पूछा कि अस्पतालों में कितने दिनों में दवा की सप्लाई होनी चाहिए और कितने दिनों में खरीद लेनी चाहिए? उन्होंने बताया कि दो-तीन दिन में खरीद लेनी चाहिए। कलेक्टर ने फिर पूछा तो फिर ऐसा क्यों चल रहा है, टेंडर करवा कर दो दिन में डिमांड पूरी कर दो, कांट्रेक्टर सप्लाई नहीं करता है तो किसी दूसरे अस्पताल से मदद लो, यह पावर आपके पास है। बैठक में यह भी सामने आया कि कस्बों-गांवों के अस्पतालों में निशुल्क दवा काउंटरों पर कोई बोर्ड या सूचना नहीं होने से मरीज भटकते हैं।

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