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परिवार हो या समाज, ज्यादातर जगह विघटन का कारण अहंकार और ईर्ष्या है: सुभाष मुनि

एक वर्ष पहले
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चाहे परिवार हो या फिर संस्थान या समाज। यदि वहां विघटन की स्थिति पैदा होती है तो इसका प्रमुख कारण अहंकार और ईर्ष्या की प्रवृति है। जिसका नुकसान सभी को उठाना पड़ता है।

यह विचार जैन श्रमण संघीय उप प्रवर्तक डॉ श्री सुभाष मुनि ‘’सुमन’’ने बुधवार को व्यक्त किए। शहर के खातर महल में होली चातुर्मास पर नियमित प्रवचन में मुनि ने कहा कि जैसे जैसे पद और नाम की लिप्सा, संपत्तियों का फैलाव और प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, वैसे वैसे लोगों में ईर्ष्या और अहंकार का भाव भी बढ़ रहा है।

ये दोनों ऐसी बुराई है जिसमें व्यक्ति खुद तो जलता ही है वो परिवार, समूह व समाज को भी विघटन के कगार पर ले आता है। नकारात्मक सोच और क्रोध इस आग को और अधिक हवा देते हैं। अहंकार के साथ जब क्रोध आता है तो विनाश का कारण बनता है।

मुनि ने कहा कि ईर्ष्या और अहंकार केवल पारिवारिक विघटन ही बल्कि कई बार तो देश व काल के लिए भी बहुत बड़ा कारण बन जाती है। हमारे देश में रामायण और महाभारत के पीछे भी यही कारण है और यही संदेश भी। जैन दर्शन में तो नम्रता और विनय को धर्म का मूल कहा गया है। हम में से कई लोग जैन दर्शन की बातें तो बड़ी बड़ी करते है, उसकी दुहाई भी देते हैं पर अपने अहम को नहीं तजते। अनेकांतवाद का सिद्वांत कहता है कि हर चीज या पहलू को दूसरे के नजरिये से भी देखने का प्रयास करो। धर्मसभा को आगमज्ञाता श्री ऋषभ मुनि ने भी संबोधित किया। प्रवचन गुरुवार को भी खातर महल में जारी रहेंगे।

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