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चंग की थाप पर गीतों के साथ डंडे बरसाकर पूजा ढूंढ

एक वर्ष पहले
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बंजारा जाति में बेटे के जन्म पर ढूंढ उत्सव की परंपरा अाज भी चली अा रही हैं। बेगूं क्षेत्र के सुवाणियां गांव में इस जाति के लाेगाें द्वारा साेमवार काे हाेली दहन से पहले चंग की थाप पर गीत गाते नाचते लकडी के डंडे बरसाकर परंपरागत ढंग से हाेली पर ढूंढ उत्सव मनाया।

सुवाणिया गांव में बंजारा जाति के जिन घराें में इस साल बेटा जन्मा उनके घराें में ढूंढ उत्सव मनाया गया। छगनलाल, रतनलाल, बालकिशन बंजारा अादि के घर बंजारा जाति के लाेग सामुहिक ढूंढ उत्सव मनाने पहुंचे। हाथाें में लकडी के डंडे लिए ताे कुछ लाेग चंग की थाप पर हाेली के लेंगी गीत, लाेकगीत गाते नााचते थिरक रहे थे। बच्चे काे तिलक पूजा कर अपनी मां या देवर के साथ बिठाया गया बाद मेंं चारांे तरफ से लाेग उस पर लकडी के डंडे बरसाने लगे। बच्चे काे काेई अांच ना अाए इसके लिए परिजन ऊपर चाराें तरफ लकडी पकड कर अाड रखते हैं। डंडाें की मार परिजन लकडी पर झेलते हैं। लकडियाें की खनखनाहट, लाेकगीताें, चंग की धुनाें से समूचा माहाैल हाेली ढूंढ उत्सव के रंग में रंग गया। जिले के बंजारा समाज में इस परंपरा का बरसों से निर्वहन हो रहा है।

बेटे के जन्म का है उत्सव है ढूंढ पूजन, दीर्घायु की कामना

सुवाणियां निवासी भीमा, हीरालाल, किशन, तेजपाल बंजारा ने बताया कि बंजारा जाति में सभी तरफ हाेली पर ढूंढ की परंपरा हैं। हमारे समाज में ढूंढ एक संस्कार हैं। बेटे के जन्म पर हाेली पर ढूंढ उत्सव मनाने के बाद ही सगाई, शादी अन्य मांगलिक कार्य हाेते हैं। प्राचीन किंवदती रही कि अासुरी शक्तियाें के भय से मुक्त किए जाने के लिए बच्चे काे शुरूअाती ताैर पर ही जागरूक, मजबूत बनाया जाता है। वहीं भगवान राम से सभी सामुहिक रूप से प्रार्थना कर बेटे के संस्कारित व दीर्घायु की कामना करते हैं। यह परंपरा हमारे समाज में वर्षाें से चली अा रही हैं।

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