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सुनना भी एक कला, जीवन को संवारना है तो अच्छा सुनने की आदत बनाओ : सुभाषमुनि

एक वर्ष पहले
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श्रमण संघीय उपप्रवर्तक डाॅ. सुभाष मुनि ने कहा कि धर्म को मानने से अधिक जरूरी समझना है। इसके लिए अच्छा सुनने की आदत बनाओ। सुनना भी एक कला है।

शनिवार को खातर महल में प्रवचन देते हुए डाॅ. सुभाष मुनि ने कहा कि जीवन को संवारना है तो अच्छी बातें और सदज्ञान को सुनने की आदत डालो। सुनने सुनने में भी फर्क होता है। दुर्भाग्य यह कि लोगों को दूसरों की प्रशंसा की बजाय निंदा सुनने में अधिक आनंद आता है। मुनि ने कहा कि हम लंबे समय से, बरसों से सुन तो बहुत रहे हैं। आगम और धर्मशास्त्र भी खूब पढ़ और सुन लिए। फिर भी जीना नहीं अाया। क्योंकि हमने जीवन को भंडार बनाने की बजाय भंगार बना दिया। जहां एक साथ कई चीजें होकर भी बेकार और अनुपयोगी है वो भंगार का गोदाम है। इसके विपरीत जहां कम या एक ही चीज हो पर काम की हो वो भंडार है। जीवन के लिए सदगुणों की उपलब्धता और समझ ही भंडार है। निंदा में उबलना नहीं और प्रशंसा में फूलना नहीं। इसे जीवन सूत्र बनाओ।

आगमज्ञाता वरिष्ठ संत ऋषभ मुनि ने सीख दी कि किसी भी धर्मस्थल या धर्मसभा में जाने से पहले अपने अहंकार, दुराग्रह, पक्षपात व मतवाद को छोड़कर जाओ। जो कहता है कि मैं सब कुछ जानता हूं। वो नादान है। मंत्री अजीत नाहर ने बताया कि प्रवचन रविवार को भी खातर महल में जारी रहेंगे।

निकुंभ में भगवान आदिनाथ का जन्म व दीक्षा कल्याणक कल

निकुंभ |जैन समाज के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ प्रभु ऋषभदेव भगवान के जन्म व दीक्षा कल्याणक निमित्त वरघाेड़ा स्नात्र पूजा सहित अन्य कार्यक्रम साेमवार काे आसावरा माताजी स्थित जैन धर्मशाला में आचार्य निपुणर| की पावननिश्रा में सम्पन्न होंगे। आयाेजन कमेटी के भंवरलाल फांफरिया ने बताया कि महोत्सव की शुरूआत सुबह नवकारसी के बाद धर्मसभा व सम्मान समारोह 9.30 बजे होगा। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए कमेटी सदस्य निमंत्रण पत्रिका बांट रहे हैं।

सच्चे आनंद के लिए धन की बजाय मन को साधने की जरूरत: मणिप्रभा

श्रमणसंघीय साध्वी मणिप्रभा ने शनिवार सुबह अरिहंत भवन मेंं प्रवचन देते हुए कहा कि सच्चे आनन्द के लिए धन की बजाय मन को साधना चाहिए। धन से कभी किसी को सुख या आनन्द नहीं मिला है। हम जिस तन और धन की सुरक्षा में लगे हुए है वो तो एक दिन धोखा देकर जाने वाला है। उन्होंने कहा कि हमारी नाव संसार सागर के बीच है। एक तट पर मोक्ष और दूसरा तट नरक का है। आप नाव को जिधर चाहें, ले जा सकते हैं। साध्वी रूचिकाश्रीजी ने कहा कि अनुचित काम करते हुए हमारी आत्मा भी रोकती है पर हम लोभवश आत्मा की आवाज नहीं सुनते हैं। अनुचित रूप से धन कमाने के लिए 18 प्रकार के पाप कर्म करने से भी नहीं चूकते। छल, प्रपंच एवं मायाजाल से धन कमाकर आनन्द की अनुभूति कैसे कर सकेंगे। जब हम व्यापार में मुनाफे की कामना करते है तो फिर जीवन के लिए घाटे का सौदा क्यों कर रहे। महत्व धन कम या ज्यादा होने का नहीं, बल्कि मर्यादित जीवन का है। मंत्री विमल कोठारी के अनुसार उर्मिला सुराना ने विचार रखे। प्रवचन अरिहंत भवन में जारी रहेगा।
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