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कपासन के लोग खाद कारखाना लगवाने को तैयार, सैटेलाइट सर्वे हो गया, सब कुछ सही लेकिन 13 अरब का प्रोजेक्ट 15 साल से ठंडे बस्ते में

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 04:50 AM IST

Chittorgarh News - औद्योगिक विकास व रोजगार की समस्या से जूझ रहे कपासन क्षेत्र में खाद कारखाने का प्रोजेक्ट करीब 15 साल से ठंडे बस्ते...

Kapasan News - rajasthan news the people of cottoncane were prepared to set up a fertilizer factory the satellite survey was done everything was right but the project of 13 billion was in cold condition for 15 years
औद्योगिक विकास व रोजगार की समस्या से जूझ रहे कपासन क्षेत्र में खाद कारखाने का प्रोजेक्ट करीब 15 साल से ठंडे बस्ते में है। हाल में जिला मुख्यालय के पास बिलिया गांव में प्रस्तावित खाद कारखाने का विरोध सामने आया है पर कपासन क्षेत्र में इसके लिए करीब 15 वर्ष पूर्व सैटेलाइट सर्वे होकर जनसुनवाई में क्षेत्रवासी अपनी सहमति दे चुके थे। भूमि अवाप्ति तक की कार्रवाई शुरू हो गई थी। प्रदेश में नई सरकार बनने व मौजूदा परिस्थिति के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधि इस कारखाने को अपने यहां लगवाने के लिए सक्रिय हो गए हैं।

कपासन से लगभग 10 किलोमीटर दूर बालारड़ा एवं रणछोड़पुरा क्षेत्र में हिंदुस्तान जिंक की एक इकाई प्रस्तावित थी। इसके लिए भूमि अवाप्ति की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। इसी बीच जिंक ने यहां अलग से यूनिट लगाने की बजाय चंदेरिया परिसर में ही विस्तार कर लिया। इसके कुछ समय बाद तत्कालीन विधायक बद्रीलाल जाट के आग्रह पर राज्य सरकार ने इसी स्थान पर डीएपी खाद का कारखाना लगाने की योजना बनाई। राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड, मुंबई (आरसीएफ) एवं राजस्थान स्टेट माइंस व मिनरल्स लिमिटेड (आरएसएमएमएल) की संयुक्त भागीदारी में प्रस्तावित इस प्रोजेक्ट का नाम राजस्थान राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स (आरआर सीएफएल) रखा गया था। प्रारंभ में योजना लगभग 830 करोड़ रुपए की थी, जो बाद में बढ़कर करीब 1300 करोड़ रुपए की हुई। जिसमें 25 करोड़ का प्रावधान पर्यावरण सुरक्षा के लिए रखा गया था। पूरी तैयारी के बाद अचानक मामला ठंडे बस्ते में चला गया। वसुंधराराजे की अगुवाई में भाजपा और अशोक गहलोत की अगुवाई में कांग्रेस की मिलाकर तीन सरकारें आकर चली गईं लेकिन किसी सरकार या जनप्रतिनिधि ने इस पर ध्यान नहीं दिया। हाल में बिलिया में प्रस्तावित खाद कारखाने का विरोध होने पर अब कांग्रेस जनप्रतिनिधि चेते हैं। कपासन पंचायत समिति के प्रधान भैरूलाल चौधरी ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, उद्योग मंत्री परसादीलाल मीणा व जिले से निर्वाचित सहकारिता मंत्री उदयलाल आंजना को पत्र लिखकर खाद का कारखाना कपासन क्षेत्र में लगवाने की मांग की है।

सैटेलाइट सर्वे: रेल, सड़क, पानी और कच्चा माल सब कुछ है...प्रोजेक्ट बनने पर कारखाने के स्थान चयन के लिए सेटेलाइट सर्वे हुआ। जिसमें पानी,बिजली, सड़क,रेलमार्ग जैसी आवश्यक सुविधाएं आसानी से उपलब्ध पाई गई। जिले में हिंदुस्तान जिंक सहित अन्य कारखानों के कारण समीपवर्ती स्थानों पर पर्याप्त कच्चा माल भी पाया गया था।

स्थान चयनित, पर्यावरणीय जनसुनवाई भी हो गई थी लेकिन तीन सरकारें बदलने के बाद भी कारखाना नहीं लग पाया

कपासन. करीब 15 वर्ष पहले कपासन क्षेत्र के बालारड़ा गांव में प्रस्तावित खाद कारखाने के प्रोजेक्ट के हैं। जो स्थान चयन व पर्यावरणीय स्वीकृति मिलने के बाद ठंडे बस्ते में चला गया था।

भास्कर संवाददाता| कपासन

औद्योगिक विकास व रोजगार की समस्या से जूझ रहे कपासन क्षेत्र में खाद कारखाने का प्रोजेक्ट करीब 15 साल से ठंडे बस्ते में है। हाल में जिला मुख्यालय के पास बिलिया गांव में प्रस्तावित खाद कारखाने का विरोध सामने आया है पर कपासन क्षेत्र में इसके लिए करीब 15 वर्ष पूर्व सैटेलाइट सर्वे होकर जनसुनवाई में क्षेत्रवासी अपनी सहमति दे चुके थे। भूमि अवाप्ति तक की कार्रवाई शुरू हो गई थी। प्रदेश में नई सरकार बनने व मौजूदा परिस्थिति के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधि इस कारखाने को अपने यहां लगवाने के लिए सक्रिय हो गए हैं।

कपासन से लगभग 10 किलोमीटर दूर बालारड़ा एवं रणछोड़पुरा क्षेत्र में हिंदुस्तान जिंक की एक इकाई प्रस्तावित थी। इसके लिए भूमि अवाप्ति की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। इसी बीच जिंक ने यहां अलग से यूनिट लगाने की बजाय चंदेरिया परिसर में ही विस्तार कर लिया। इसके कुछ समय बाद तत्कालीन विधायक बद्रीलाल जाट के आग्रह पर राज्य सरकार ने इसी स्थान पर डीएपी खाद का कारखाना लगाने की योजना बनाई। राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड, मुंबई (आरसीएफ) एवं राजस्थान स्टेट माइंस व मिनरल्स लिमिटेड (आरएसएमएमएल) की संयुक्त भागीदारी में प्रस्तावित इस प्रोजेक्ट का नाम राजस्थान राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स (आरआर सीएफएल) रखा गया था। प्रारंभ में योजना लगभग 830 करोड़ रुपए की थी, जो बाद में बढ़कर करीब 1300 करोड़ रुपए की हुई। जिसमें 25 करोड़ का प्रावधान पर्यावरण सुरक्षा के लिए रखा गया था। पूरी तैयारी के बाद अचानक मामला ठंडे बस्ते में चला गया। वसुंधराराजे की अगुवाई में भाजपा और अशोक गहलोत की अगुवाई में कांग्रेस की मिलाकर तीन सरकारें आकर चली गईं लेकिन किसी सरकार या जनप्रतिनिधि ने इस पर ध्यान नहीं दिया। हाल में बिलिया में प्रस्तावित खाद कारखाने का विरोध होने पर अब कांग्रेस जनप्रतिनिधि चेते हैं। कपासन पंचायत समिति के प्रधान भैरूलाल चौधरी ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, उद्योग मंत्री परसादीलाल मीणा व जिले से निर्वाचित सहकारिता मंत्री उदयलाल आंजना को पत्र लिखकर खाद का कारखाना कपासन क्षेत्र में लगवाने की मांग की है।

सैटेलाइट सर्वे: रेल, सड़क, पानी और कच्चा माल सब कुछ है...प्रोजेक्ट बनने पर कारखाने के स्थान चयन के लिए सेटेलाइट सर्वे हुआ। जिसमें पानी,बिजली, सड़क,रेलमार्ग जैसी आवश्यक सुविधाएं आसानी से उपलब्ध पाई गई। जिले में हिंदुस्तान जिंक सहित अन्य कारखानों के कारण समीपवर्ती स्थानों पर पर्याप्त कच्चा माल भी पाया गया था।

जनसुनवाई में क्लीन चिट मिलते ही ठंडा हो गया मामला

वसुंधराराजे के पहले शासनकाल में सर्वे के बाद एसडीएम कार्यालय में आरआर सीएफएल द्वारा पर्यावरण की जनसुनवाई रखी गई। जिसमें तत्कालीन विधायक बद्रीलाल जाट समेत क्षेत्रवासियों ने सकारात्मक रुख दिखाया। कोई विरोध नहीं हुआ पर इसके बाद मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला गया।

इसलिए जरूरी: विकास व रोजगार में पिछड़ा है यह क्षेत्र

प्रधान चौधरी ने सीएम व मंत्रियों को लिखे पत्र में कहा कि जिले में एक जगह खाद कारखाने का विरोध हो रहा है पर कपासन क्षेत्र में पूरी तैयारी के बाद भी कारखाना अटक गया। क्षेत्रवासी इसके लिए तैयार हैं। बड़ी औद्योगिक इकाई नहीं होने से ही कपासन क्षेत्र अपेक्षित विकास नहीं कर पाया। उन्होंने इस संबंध में जिले के मंत्री उदयलाल आंजना को भी अवगत कराया।

एक विधायक को जवाब नहीं मिला, दूसरे को कहा केंद्र में अटका है मामला...पिछले 10-12 सालों में जनप्रतिनिधियों ने इस मामले को राज्य सरकार के समक्ष उठाया भी, लेकिन नतीजा नहीं आया। अशोक गहलोत सरकार में विधायक शंकरलाल बैरवा ने विधानसभा में मामला उठाया, लेकिन वस्तुस्थिति का पता नहीं लग पाया था। इसके बाद दोबारा वसुंधराराजे सरकार बनने पर विधायक अर्जुनलाल जीनगर ने पूछा तो बताया गया कि राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को एनओसी भेजी थी, उस पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई थी

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