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प्रदोष काल में ही होली दहन, भद्रा नहीं होने से सालों बाद बना महाशुभ संयोग

चौमू. होली के पहले दिन बाजार में पिचकारी व गुलाल खरीदते लोग। कार्यालय संवाददाता | चौमू जिले में गुरुवार को होली...

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 02:40 AM IST
चौमू. होली के पहले दिन बाजार में पिचकारी व गुलाल खरीदते लोग।

कार्यालय संवाददाता | चौमू

जिले में गुरुवार को होली व शुक्रवार को धुलंडी पर्व उल्लास के साथ मनाया जाएगा। शहर के बाजारों में होली पर्व की खरीदारी करने वालों की भीड़ रही। बाजारों में बुधवार को लोगों ने गुलाल, पुचकारियां, चावल आिद सामानों की लोगों ने खरीदारी की। वहीं पर्व पर दो दिन की छुट्टी होने के कारण व बाहर रहने वाले लोगों के घरों पर लौटने के चलते वाहनों में भारी भीड़ नजर आई। ज्योतिषाचार्य पं. योगेश शर्मा ने बताया कि गुरुवार सवेरे 8:58 से रात्रि 7:40 बजे तक भद्रा रहेगी। शास्त्रानुसार होलिका दहन भद्रा के बाद किया जाएगा। गुरुवार रात्रि 7:41 बजे होलिका दहन करना श्रेष्ठ रहेगा। उन्होंने बताया कि होली दहन के समय पूर्णिमा तिथि, प्रदोष काल व भद्रा का नहीं होना ऐसा महाशुभ संयोग कई सालों बाद बना है।

शहर के सीनियर सिटीजन मुरारीलाल शर्मा का कहना है कि अब होली में निरंतर लोगों का उत्साह कम होता जा रहा है। 30 वर्ष पूर्व होली का डांडा रोपने के साथ ही लोगों का होली का धमाल, चौपाल में अर्द्धरात्रि तक लोगों का जमावड़ा रहा करता था। एक सप्ताह पूर्व से रंगों का खेलना आम बात थी। काफी नुकसान होने पर भी लोगों में संयम रहता था। चंग की थाप पर स्वांग बने लोग रात भर नाचते गाते रहते थे। महिलाएं भी होली के मधुर गीतों से होली का त्यौंहार आने का अहसास करा देती थी, जो आज समाप्त सा हाे गया है। आज की होली मात्र एक औपचारिकता रह गई है। आज लोग गुलाल लगाने पर भी परहेज करते हैं। अापसी भाईचारा समाप्त सा दिखने लगा है। त्योहार पर आस पड़ोस के लोगों का साथ मनाना तो दूर की बात परिवार के लोग भी साथ बैठने व होली जैसे त्योहार को मनाने में एकजुटता नहीं रखते हैं। समय के साथ इसका स्वरूप भी बिगड़ता जा रहा है। चौमू में बाेराजी निकालने की परंपरा यथावत चल रही है। होली दहन के बाद रात्री को बोराजी की शवयात्रा निकालकर उसका अंतिम संस्कार किया जाता है।

अब सुनाई नहीं देती चंग की थाप

चौमू. चंग की थाप पर होली गीत गाती युवाओं की टोली, जो अब कम ही नजर आती है।

किशनगढ़-रेनवाल| बदलते जमाने के साथ अब चंग की थाप पर होली की धमाल सुनाई नहीं देती है। पहले होली से कई दिन पूर्व गांवों में लोग देर रात तक चंग बजाकर होली की धमाल गाया करते थे। पूरा गांव होली का त्योहार जोश व उमंग के साथ मनाया करते थे। रात को देर तक लोगों की टोलियां में चंग की थाप पर नाचते गाते रास्तों से गुजरते तो माहौल त्योहार के रंग में रम जाता था। महिलाएं होली से एक माह पूर्व होली का डांडा रोपण के दिन से गांव, कस्बे में होली के नियमित गीत गाया करती थी जो पूरे एक माह चलते थे, लेकिन बदलते जमाने के साथ अब चंग की थाप मंद पड़ गई है। अब देश की संस्कृति से जुड़ा होली का पर्व पाश्चात्य कल्चर के कारण लुप्त होने के कगार पर है। वर्तमान पीढ़ी को पांरपरिक त्योहार में रुचि नहीं रही है। अब होली दहन के समय जरूर कुछ लोग चंग को बजाकर इसकी औपचारिकता पूरी करते है। परंपरागत त्योहार के प्रति नई जनरेशन का झुकाव कम होने से पुरानी पीढ़ी के लोग काफी आहत है। लोगों ने बताया कि यदि यहीं रफ्तार रही तो आने वाले वर्षों में पुराने त्योहार की जगह न्यू ईयर, वैलेंटाइन डे ले लेंगे, जो भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। शिक्षाविद् जगदीश प्रसाद सराेज ने बताया कि होली हिन्दूओं का सबसे बड़ा त्योहार है। पहले होली के कई दिन पूर्व लोग कपड़े की बड़ी दडी (बाॅल) बनाकर दो टीमें बनाकर हॉकी की तरह दड़ी सोटा खेला करते थे। गांव के लोग खेल में शामिल होने से बड़ा सकुन मिलता था। सभी में भाईचारा बना रहता था, लेकिन यह अब यादें रह गई है। वरिष्ठ पत्रकार रामसिंह शेखावत ने बताया कि पारंपरिक त्योहार, मेले, खेलों आदि को बनाए रखने के लिए युवा पीढ़ी को आगे आने की आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति को पूरी दूनिया में सराहा जाता है जबकि हमारे यहां परंपरागत त्योहारों के प्रति रूझान कम होता जा रहा है।

रंग-गुलाल के दाम गत वर्ष से 20 फीसदी महंगे, पिचकारी 200 से 700 रुपए तक

चौमू. होली पर घर वापसी के कारण बस स्टैंड पर यात्रियों की भीड़।

रावणगेट बाजार में एक कलर बेचने वाले अमित कुमावत ने बताया कि लाल रोज, हरा रोज, सिल्वर, ब्लेक रोज गुलाल बाजारों में बिक रही है, जो करीब 100 रुपए प्रतिकिलो के भाव है। पुचकारी भी 200 रुपए से लेकर 700 रुपए तक बाजार में उपलब्ध है। सबसे महंगी पुचकारी म्यूजिकल है। कलर में गत वर्ष की अपेक्षा इस बार करीब 20 प्रतिशत की भावों में तेजी बताई जा रही है।

फीका पड़ने लगा त्योहार का रंग