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पाठशाला चलाने के लिए 51 साल बाद भी खुद का भवन तक नहीं, कैसे हो पढ़ाई

भास्कर न्यूज | दौसा ग्रामीण सरकार की और से सब पढे़ सब बढे़ लेकिन कैसे यंहा ना तो बालको को स्कूलो में बैठने के लिए...

Dainik Bhaskar

May 03, 2018, 02:45 AM IST
भास्कर न्यूज | दौसा ग्रामीण

सरकार की और से सब पढे़ सब बढे़ लेकिन कैसे यंहा ना तो बालको को स्कूलो में बैठने के लिए कमरे है और ना ही सिर छिपाने के लिए छाया हैरानी तब हुई जब मालूम हुआ कि विभाग की और से योजनाओ पर लाखो रूपऐ खर्च करने के बाद भी पाठशाला चलाने के लिए 51 वर्षो बाद भी खुद का भवन तक नही है।

ग्रामीण क्षेत्र में संचालित प्राथमिक उच्च प्राथमिक माध्यमिक सीनीयर माध्यमिक स्कूलो के भवनो के हाल देखकर तो यही लगता हेै कि ये सरकारी स्कूल हेै जंहा सरकार इन्ही बच्चो व इनके विधालयों के लिए हर वर्ष करोडो रूपऐं खर्च कर नीतीयां तो बनाती है । मजेदार बात तो यह है कि ऐसे कई विधालय संचालित है जिनके पास खुद का भवन तो दूर बालको के लिए बैठने तक को जमीन नही है । अधिकारियों की शिथिलता के चलते विभाग की और से कक्षा कक्षो शौचालयो भवनो व अन्य सुविधाओ व निर्माण कार्यो पर लाखो करोडो रूपऐ खर्च करने के बाद भी विभाग आज तक इन विधालयों के भवनो व जमीन को अपने नाम तक नही करा पाया।

जिसके चलते मजबूरन बालको को सर्दी गर्मी हो या बारिश बच्चो को खुले आसमान तले या फिर जीर्ण शीर्ण कमरो में पढने को विवश होना पड़ रहा है । हालात यह हे कि स्कूल खुलने के 30/40वर्षो बाद भी कोई स्कूल तो मंदिर में चल रहे है तथा कोई जर्जर बिल्डिगों में । ऐसे में बड़ा सवाल यह हेै कि विभाग की और से चलाया जा रहा सब पढे सब बढें आखिर कब चलेगा यह। नेता अपनी राजनीती तथा अफसर अपनी अफसरी में वयस्त है कि उन्हे बच्चो के भविष्य की और ध्यान देने की फुरसत ही नही है।

जानकारी के अनुसार राजकीय प्रवेशिका माध्यमिक विधालय बनियाना 38 वर्षो बाद आज भी खुद के भवन में ना चलकर मंदिर में चल रही है । जिसके चलते आज भी बालको को भवन के अभाव में हर मौसम की मार सहने को मजबूर होना पड़ रहा है । वही राजकीय प्राथमिक विधालय कान्दोली व मीनावाड़ा पर सरकार की और से भवन निर्माण पर लाखेा रूपऐ खर्च करने के बाद भी 30 वर्षो से विधालय भवन पर खुद का स्वामित्व नही मिलने के कारण आज भी खातेदारी भूमी में चल रही है । जिसके चलते अध्यनरत बालको को ना तो आने जाने के लिए रास्ता है। और ना ही बैठने व प्रार्थना करने के लिए मैदान जिसके चलते रोजाना बालक भय के साऐ में बैठकर शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर है।

इनका कहना है ब्लाँक प्रारंभिक शिक्षा अधिकारी सिकराय राजेन्द्र मीणा का कहना है कि स्कूल के लिए पूर्व खातेदार ने भूमी दान की थी । दान करने के बाद खातेदार की मृत्यु हो जाने के कारण स्कूल के नाम नामांतकरण नही खुल पाया जिसके चलते आज भी भूमी खाोदारी भूमी के नाम ही चल रही है ।

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