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कोर्स अधूरा, विद्यार्थी वनवीक सीरीज व पासबुक से कर रहे परीक्षा की तैयारी
संभवत सबसे ज्यादा सैलेरी कालेज शिक्षा में है। इसके बावजूद विद्यार्थियों की नियमित क्लास नहीं लगती हैं। इसका एक बड़ा कारण दाैसा का जयपुर के पास हाेना भी है, क्याेंकि करीब 70 फीसदी स्टाफ जयपुर से अप-डाउन करता है। हिंदी, अंग्रेजी अाैर इतिहास विषय के लेक्चरर के पद भी खाली हैं। एेसी स्थिति में विद्यार्थियों काे माेटी फीस देकर ट्यूशन का सहारा लेना पड़ता है। वहीं कुछ विद्यार्थियों काे वन वीक सीरीज खरीदकर भी पढ़ाई करनी पड़ती है। मजबूरन कुछ छात्राें काे इधर-उधर से नाेट्स लेकर तैयारी करनी पड़ती है।
जिला मुख्यालय पर तीन सरकारी कालेज हैं, जहां हिंदी, अंग्रेजी अाैर इतिहास विषय के लेक्चरर के पद खाली हैं। इस संबंध में तीनाें प्राचार्य से अलग-अलग बात की ताे सभी का एक ही कहना था कि हमने वैकल्पिक व्यवस्था कर कक्षाअाें में नियमित पढ़ाई कराई। हालाकि एक प्राचार्य ने इस बात काे स्वीकार किया कि नियमित क्लास नहीं लगने का एक कारण सरकार द्वारा संचालित विभिन्न गतिविधियां हैं, जिन्हें पूरा कराने में ही समय बीत जाता है। इससे क्लास नहीं लगने से विद्यार्थी फिर कालेज अाना बंद कर देते हैं। इन दिनाें राजस्थान विश्वविद्यालय की परीक्षा चल रही है।
हिंदी व इतिहास का कोर्स ही पूरा नहीं हुआ, परीक्षा कैसे दें
श्री संत सुंदरदास राजकीय महिला पीजी कालेज की छात्राओं का कहना है कि हिंदी व इतिहास के एक एक लेक्चरर नहीं हाेने से अन्य लेक्चरर ने क्लास तो ली, लेकिन पढाई पूरी नहीं हुई। ऐसे में कालेज से बुक तथा मार्केट से वन वीक सीरीज खरीदकर पढ़ाई की। नियमित छात्रा हाेने के बावजूद छात्राअाें काे परेशानी झेलनी पड़ी।
अंग्रेजी व हिंदी की एक दिन भी क्लास नहीं लगी
राजकीय कला कालेज में बीए पार्ट फर्स्ट के छात्र साहिल सिंह राजपूत का कहना है कि अंग्रेजी व हिंदी के लेक्चरर नहीं हाेने के कारण पूरे साल एक दिन भी क्लास नहीं लगी। कई बार प्राचार्य अाैर छात्रसंघ अध्यक्ष से भी बात की, लेकिन काेई सुनवाई नहीं हुई। एेसी स्थिति में वन वीक सीरीज का सहारा लेकर पढ़ाई की।
चार साल से डीपीसी नहीं हाेने से प्राचार्य की कुर्सी खाली
3-4 साल से डीपीसी नहीं हाेने से कालेजाें में सीनियर माेस्ट लेक्चरर ही प्राचार्य की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इससे कालेज स्तर का काेई काम अटक ताे नहीं रहा, लेकिन कार्यवाहक प्राचार्य अपनी शक्तियाें काे दूसरे लेक्चरर काे देने नहीं दे सकते, इससे काम का बाेझ बढ़ने से कार्यवाहक प्राचार्य काे परेशानी झेलनी पड़ती है। डीपीसी से नियुक्त प्राचार्य का दबदबा रहता है, जबकि कार्यवाहक काे मातहताें के सामने नरम रहना पड़ता है। इसका एक कारण यह भी है कि डीपीसी हाेने पर पता नहीं काेई मातहत ही प्राचार्य बनकर बाॅस बन जाए।
-डाॅ. एस.डी. गुप्ता, कार्यवाहन प्राचार्य पीजी कालेज
सरकार की गतिविधियां ही इतनी हाेती है कि समय बीत जाता है
नियमित कक्षा अाैर पढ़ाई नहीं हाेने का एक बड़ा कारण सरकार की विभिन्न गतिविधियां भी हैं, जिन्हें पूरा कराने में ही समय बीत जाता है। कालेज में अाए दिन प्राेग्राम चलने से नियमित क्लास नहीं चला पाती हैं, इससे फिर विद्यार्थी कालेज अाना बंद कर देते हैं। रही खाली पदाें की बात ताे हमारी पूरी काेशिश रहती है कि नियमित क्लास चलें। इसके लिए एक साथ कई क्लास बैठाकर पढ़ाना पड़े ताे हमें एेसा भी करते हैं। वहीं जरुरत के अनुसार हमने हिंदी का लेक्चरर सिकराय कालेज भेजा, जिससे वहां भी छात्राें की पढ़ाई बाधित नहीं हाे।
-डाॅ.ज्याेत्स्ना श्रीवास्तव, कार्यवाहक प्राचार्य
कला कालेज
सब काे साथ लेकर चलना
बड़ी चुनाैती हाेती है
प्राचार्य की तुलना में कार्यवाहक प्राचार्य काे ज्यादा संवेदनशील हाेकर काम करना पड़ता है, क्याेंकि सीनियर्टी में काेई ज्यादा अंतर नहीं हाेने से कई बार सामने वाले का ईगाे हट हाे सकता है। स्टाफ के साथ तालमेल बैठाकर चलना एक बड़ी चुनाैती हाेती है। प्राचार्य की पावर ताे अायुक्तालय ही देता है, लेकिन कार्यवाहक की मानसिकता के चलते खुलकर काम करने में कहीं न कहीं प्राॅब्लम अाती है। हालाकि कालेज काम हाेते हैं, वे अटकते नहीं हैं।-
संताेष गढ़वाल, कार्यवाहक प्राचार्य महिला कालेज
कुछ लेक्चरर पढ़ाना ही नहीं चाहते
डीपीसी नहीं हाेने से कई साल से कार्यवाहक प्राचार्य ही कालेज चला रहे हैं, जिन्हें अायुक्तालय ने पूरी पावर दे रखी हैं। इसके बावजूद कुछ कार्यवाहक प्राचार्य अपनी पावर का उपयाेग करने से हड़बड़ाते हैं, जबकि उन्हें खुल कर काम करना चाहिए। हालाकि यह सही बात है कि प्राचार्य नहीं हाेने से विकास कार्याें काे जाे गति मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल पाती है। कल तक साथ-साथ बैठने-उठने वालाें में से ही किसी एक काे कार्यवाहक प्राचार्य बनाने से दबंगता दिखाने के लिए हिम्मत जुटाने के साथ तारतम्य बैठाना भी टेढ़ी खीर हाेता है। कुछ लेक्चरर पढ़ाना ही नहीं चाहते हैं, इससे कालेजाें में शिक्षा का ढर्रा बिगड़ रहा है। इसके लिए विद्यार्थी भी कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं, वरना विद्यार्थी प्राचार्य या लेक्चरर के सामने खड़े हाेंगे ताे क्लास में पढ़ाना ही पड़ेगा।
-शंकर लाल शर्मा, रिटायर्ड प्राचार्य महिला कालेज दाैसा
काॅलेज स्वीकृत खाली विद्यार्थी
सरकारी कॉलेजों में नियमित कक्षाएं ही नहीं लगती, पढ़ाई में ढिलाई
कला काॅलेज 65 3 7320
महिला काॅलेज 26 2 2323
पीजी कालेज 41 00 1772
दौसा | राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय दौसा।