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पति बन गए साधू, तसीमो की विद्यादेवी ने संघर्ष कर चार बेटियों को स्नातक तक दिलाई शिक्षा,आज भी हैं सक्रिय

एक वर्ष पहले
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कूडो में बेटों से पहले बेटियां लेकर आई गोल्ड और ब्रांज

धौलपुर| बेटियां अगर कुछ करने की ठान ले तो उसे पूरा ही करके रहती हैं। कूडो और कराटे में पहला गोल्ड और ब्रांज बेटियों के खाते में दर्ज में है। पिछले वर्ष बीकानेर में आयोजित हुए 6वीं स्टेट कूडो मिक्स मार्शल आर्ट्स चैंपियनशिप में शिवालिया मीणा पुत्र रामनाथ मीणा निवासी झोर वाली माता के पास और प्रगति सिंह पुत्री सुशील कुमार निवासी कलेक्ट्रेट के सामने ने भाग लिया था। जिसमें शिवालिया मीणा ने स्टेट प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल हासिल किया था, वहीं प्रगति

प्रगति

धौलपुर| बेटियां अगर कुछ करने की ठान ले तो उसे पूरा ही करके रहती हैं। कूडो और कराटे में पहला गोल्ड और ब्रांज बेटियों के खाते में दर्ज में है। पिछले वर्ष बीकानेर में आयोजित हुए 6वीं स्टेट कूडो मिक्स मार्शल आर्ट्स चैंपियनशिप में शिवालिया मीणा पुत्र रामनाथ मीणा निवासी झोर वाली माता के पास और प्रगति सिंह पुत्री सुशील कुमार निवासी कलेक्ट्रेट के सामने ने भाग लिया था। जिसमें शिवालिया मीणा ने स्टेट प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल हासिल किया था, वहीं प्रगति को ब्रांज मिला था।

धौलपुर की घंटाघर की रहने वाली पूनम गोस्वामी पुत्री राकेश गोस्वामी निवासी घंटाघर ने 8 वर्ष की उम्र में इंटरनेशनल कराटे चैंपियनशिप प्रतियोगिता में ब्रांज मेडल ला चुकी है। पूनम ने बताया कि उसने जुलाई में जयपुर में 4 आईएनएएस इंटरनेशनल कराटे चैपियनशिप में भाग लिया था, जिसमें उसे ब्रांज मिला है।

पूनम


शिवालिका

बेटियों को पढ़ाने में भी खूब सुने ताने, लोग बोलते थे कामकाज तो सिखाए नहीं जाते

विद्यादेवी बताती हैं कि बेटियों को पढ़ाने के समय तंज कसे जाते थे। लोग कहते थे मास्टरनी बनाएगी। घर के कामकाज तो सिखाए नहीं जाते। तसीमो से दोनों बड़ी बेटियों ने आठवीं तक शिक्षा प्राप्त की, लेकिन इसके बाद की शिक्षा के लिए दिक्कत थी। तब अपनी मां एवं भाईयों के सहयोग से जीवाजी विश्वविद्यालय से 1973 में बडी बेटी ने स्नातक एवं एवं अन्य तीनों बहनों ने इसी तरह उच्च शिक्षा प्राप्त कर तब जाकर उन्हें सकून मिला। विद्यादेवी बताती हैं कि उनकी चारों बेटियों में से कोई भी स्नातक से भी कम पढ़ा लिखा नहीं है।

धौलपुर| जब 10 साल की थी, तब मुरैना जिले के गांव कोथर कलां गांव में ही सुनने को मिलता था कि बेटियां होने पर उन्हें तंबाकू या अफीम खिलाकर मार दिया गया। मैं सात भाइयों के बीच में अकेली थी। पूरे कुटुंब में अकेली बेटी थी, इसलिए शायद मैं जिंदा रह गई और मुझे परिवार में सबसे ज्यादा प्यार मिला। यह कहना है तसीमो की रहने वाली 89 वर्षीय विद्यादेवी का। विद्यादेवी बताती हैं कि नवंबर 1932 को जन्म के बाद आठवीं तक शिक्षा ग्वालियर में चाचा कर्नल द्वारिका सिंह तोमर की देख रेख में हुई। इसके बाद 14 वर्ष की आयु में 1946 में तसीमो शहीद छतर सिंह पंचम सिंह की शहादत से पूर्व विवाह हुआ था। तसीमों में विवाह हुआ। शादी के बाद जब गांव में आई तो वह पहली सबसे ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू थी। ससुराल पक्ष तसीमो में जमींदार किसान थे। सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी होने के कारण उस जमाने में चिट्ठी लिखाने और पढाने के लिए महिलाओं की घर पर भीड लगी रहती थी जिसे देखकर सास-ससुर बड़े प्रसन्न रहते थे। इसके चार पुत्रियों ने जन्म लिया। 1952 पहली 1955 दूसरी 1959 तीसरी एवं 1967 चौथी पुत्री हुई। तीन पुत्रियों के बाद कुछ ताने भी सुनने को मिले। पति भी साधू बन गए थे। तब मुझे चाचा ने सरकारी अध्यापिका पद संभालने की जिद की, जो मुझे परिवार की जिम्मेदारी सरकारी नौकरी से उचित प्रतीत हुई।
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