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भीलूड़ा में एक पहल ने बदल दी वर्षों पुरानी परंपरा की तस्वीर

जिले के भीलूड़ा में बरसों पुरानी राड़ की परंपरा अब खत्म होने जा रही है। पिछले 10 सालों से प्रशासन, पुलिस, ग्रामीण और...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 01, 2018, 02:55 AM IST

जिले के भीलूड़ा में बरसों पुरानी राड़ की परंपरा अब खत्म होने जा रही है। पिछले 10 सालों से प्रशासन, पुलिस, ग्रामीण और अदालतों ने प्रयास किए, लेकिन बात नहीं बनी।

हर बार इस प्रयासों को झटका तभी लगा, जब आपस में किसी ने समझदारी नहीं दिखाई, लेकिन पिछले एक माह से एक जनप्रतिनिधि की पहल, युवाओं की समझदारी, ग्रामीणों की सीख और प्रशासन का सहयोग से बात बन गई है, जबकि यह परंपरा कई सालों से चल रही थी।होली के ठीक दूसरे दिन धुलंडी के मौके पर रघुनाथ मंदिर के ठीक नीचे बस स्टैंड क्षेत्र में राड़ का खेल होता था।

दूसरी ओर 10 साल पहले से ही कैबिनेट मंत्री कनकमल कटारा, तत्कालीन प्रशासन ने लगातार प्रयास किए। इस बार कटारा के नेतृत्व में ग्रामीणों ने जमकर समझदारी दिखाई। अच्छे और बुरे को लेकर काफी विचार-विमर्श किया। आखिर भगवान रघुनाथ को साक्षी मानकर बैठक की और अंतिम निर्णय यही रहा कि इस बार से राड़ नहीं खेली जाएगी।



पुलिस, प्रशासन और अदालतों ने 10 साल से भीलूड़ा की राड़ को बंद कराने के लिए प्रयास किए

ऐसे की पहल और मिला सहयोग

पूर्व मंत्री कटारा पिछले 10 दिनों से लगातार राड़ में भाग लेने वाले समाजों के लोगों से मिल रहे हैं। उन्हें समझाया, फिर हर आदिवासी मोहल्ले और लोगों से मिलकर एक राड़ नहीं खेलने के लिए संकल्पित किया। आखिर में सभी ग्रामीणों की बैठक लेकर राड़ को नहीं खेलने के लिए प्रेरित किया।

पहले हाथों से खेलते थे, फिर गोफण से पत्थर मारना शुरू हुआ

ग्रामीण बताते हैं कि पहले दो गुटों के बीच हाथों से राड़ होती थी। समय बदलता गया और धीरे-धीरे राड़ में गोफड़ का उपयोग होने लगा। फिर गोफड़ से एक-दूसरे के ऊपर पत्थर बरसाने लगे, लेकिन इस बदलाव से खून खराबा होने लगा। हर साल 50 से 70 लोग सामान्य रूप से घायल हो जाते थे। अब एक बार फिर से अच्छी पहल के रूप में सभी ने निर्णय किया है। इसके तहत अब पत्थरों की राड़ पर पूर्ण पाबंदी रहेगी।

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Web Title: भीलूड़ा में एक पहल ने बदल दी वर्षों पुरानी परंपरा की तस्वीर
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