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मामा-भांजे हाथ में रूई लेकर 10 बार ढूंढाते हैं

Dungarpur News - अब तक आपने होली पर नौनिहाल बच्चों को ढूंढाते हुए देखा होगा, लेकिन वागड़ की परंपरा में बच्चों से पहले रूई को ढूंढाते...

Dainik Bhaskar

Mar 01, 2018, 02:55 AM IST
मामा-भांजे हाथ में रूई लेकर 10 बार ढूंढाते हैं
अब तक आपने होली पर नौनिहाल बच्चों को ढूंढाते हुए देखा होगा, लेकिन वागड़ की परंपरा में बच्चों से पहले रूई को ढूंढाते हैं। बाद में इसी रूई से दशामाता व्रत का धागा तैयार होता है, जिसे होली के 10 दिन बाद महिलाएं अपने गले में धारण करती हैं। वागड़ की यह परंपरा है, जिसे हर साल पालन किया जाता है।

होली के दूसरे दिन जब बच्चों को ढूंढ़ाया जाता है, उसके ठीक पहले सभी ग्रामीण गांव के चौराहे पर एकत्रित होते हैं। वहां पर गांव में ही रहने वाले मामा-भांजे को आमने-सामने बैठाया जाता है। गांव का पंडित उन्हें तिलक कर हाथ में रूई देता है। बीच में होलिका दहन की आग रखी जाती है।

इस पर धूप और नारियल के टुकड़े डालते हैं। फिर मामा और भांजा दोनों आपस में 10 बार रूई को ढूंढाते हैं। बाद में इसी रूई से दशामाता व्रत के लिए सात गांठों वाला धागा तैयार होता है, जिसकी पूजा होली के 10 दिनों बाद आने वाले दशामाता व्रत के दिन बड़ की पूजा करने के बाद महिलाएं धारण करती हैं।

रंगों के त्योहार होली पर रूई को ढूंढाने की कहानी सबसे पहले में

वागड़ में होली पर बच्चों से पहले रूई को ढूंढाते हैं, इसी से दशामाता व्रत के धागे तैयार होते हैं, 10 दिन बाद महिलाएं धारण करती हैं अपने गले में

असर : संतान विहीन दंपती के लिए यह व्रत फलदायी

जिन परिवारों में दंपतियों को संतान की प्राप्ति नहीं होती है, ऐसे दंपती को यह व्रत जरूर करना चाहिए। संतान प्राप्ति के लिए इस व्रत को अन्य व्रतों से बलशाली माना जाता है। हालांकि परिवार में यह भी परंपरा रहती है कि सास बुजुर्ग हो जाती है, तो दशा मां का धागा अपनी बहू को देती है, फिर इसी तरह से यह परंपरा चलती रहती है।

यह है कारण

ढुंढाई हुई रूई से बने धागे में होता है समृद्धि का वास और होलिका का आशीर्वाद ऐसा मानते हैं कि ढूंढाई हुई रूई से बनने वाले धागे में होलिका का आशीर्वाद ओर समृद्धि का वास होता है। जब कोई महिला इस धागे को अपने गले में धारण करती है तो पूरे वर्ष तक घर की दशा सुधरी हुई रहती है। यह काम मामा-भांजा करते हैं। यदि किसी गांव में मामा-भांजा नहीं मिलते हैं तो पड़ोस के गांव से यह परंपरा निभाकर रूई को लाया जाता है। हालांकि कुछ गांव ऐसे भी हैं, जहां पर होलिका के चारों ओर रूई को ढूंढाया जाता है। वैसे अलग-अलग गांवों में अलग-अलग परंपराएं बनी हुई हैं।

भास्कर




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