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गणेशजी की प्रतिमा पूर्व या ईशान कोण में ही करें स्थापित

13 सितंबर को गणेश चतुर्थी है और इसी दिन ही गणेश की प्रतिमाएं भी स्थापित की जाती है। लेकिन कई बार अनजाने में गलत जगह या...

Danik Bhaskar | Sep 12, 2018, 04:00 AM IST
13 सितंबर को गणेश चतुर्थी है और इसी दिन ही गणेश की प्रतिमाएं भी स्थापित की जाती है। लेकिन कई बार अनजाने में गलत जगह या वास्तु के अनुसार गलत दिशा में गणेश जी की मूर्ति स्थापित हो जाती है।

जिसके कारण पूजा का पूरा फल नहीं मिल पाता। उलटा दोष भी लगता है। गणेश स्थापना के लिए दिशा और जगह की शुद्धता का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। वहीं इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि गणेश जी की पीठ किस दिशा में होनी चाहिए। वहीं मिट्टी के गणेश बनाकर स्थापित करने से पृथ्वी मां का भी आशीर्वाद मिलता है। ज्योतिष के मुताबिक मिट्टी पंच तत्व में भी शामिल है। लिहाजा मिट्टी के गणेश के ही स्थापना करे। पंडित तुलजा शंकर भट्ट ने बताया कि मिट्टी गणेश की प्रतिमा बनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ है और हर व्यक्ति को चाहिए कि वह मिट्टी से निर्मित कर ही गणेश बनाए और उसकी स्थापना करे।

13 सिंतबर को गणेश चतुर्थी के दिन मिट्टी के गणेश की स्थापना करने से पृथ्वी मां का भी मिलता है आशीर्वाद

गणेश प्रतिमा दक्षिण, पश्चिम या नैऋत्य कोण में नहीं रखे

पंडित तुलजा शंकर भट्ट के अनुसार गणेश जी को विराजमान करने के लिए ब्रह्म स्थान, पूर्व दिशा और उत्तर पूर्व कोण शुभ माना गया है लेकिन भूलकर भी इन्हें दक्षिण और दक्षिण पश्चिम कोण यानी नैऋत्य में नहीं रखें इससे हानि होती है। घर या ऑफिस में एक ही जगह पर गणेश जी की दो मूर्ति एक साथ नहीं रखें। वास्तु विज्ञान के अनुसार इससे उर्जा का आपस में टकराव होता है जो अशुभ फल देता है। अगर एक से अधिक गणेश जी की मूर्ति है तो दोनों को अलग-अलग स्थानों पर रखें।

प्रतिमा के पीछे दीवार होना जरूरी, खाली जगह न रखे

भगवान गणेश को मंगलमुखी भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि गणेश जी के मुख की तरफ समृद्धि, सिद्धि, सुख और सौभाग्य होता है। वहीं गणेश जी के पृष्ठ भाग पर दुख और दरिद्रता का वास माना गया है। इसलिए गणेश जी की स्थापना के समय ये ध्यान रखें कि मूर्ति का मुख दरवाजे की तरफ नहीं होना चाहिए। वहीं पीछे दीवार होनी चाहिए। घर में गणेश जी की बांयी ओर सूंड वाली मूर्ति रखना अधिक मंगलकारी माना गया है क्योंकि इनकी पूजा से जल्दी फल की प्राप्ति होती है। दांयीं ओर सूंड वाले गणपति देर से प्रसन्न होते हैं।