• Hindi News
  • Rajasthan
  • Dungarpur
  • किसान खेती में नई तकनीक के इस्तेमाल व वैज्ञानिकों की सलाह से बढ़ा सकते हैं उत्पादन
--Advertisement--

किसान खेती में नई तकनीक के इस्तेमाल व वैज्ञानिकों की सलाह से बढ़ा सकते हैं उत्पादन

Dungarpur News - सबसे पहले मिट‌्टी की जांच कराएं और कृषि वैज्ञानिकों की सलाह से खाद एवं सूक्ष्म पोषक तत्व डालें ललित शर्मा |...

Dainik Bhaskar

Apr 17, 2018, 03:35 AM IST
किसान खेती में नई तकनीक के इस्तेमाल व वैज्ञानिकों की सलाह से बढ़ा सकते हैं उत्पादन
सबसे पहले मिट‌्टी की जांच कराएं और कृषि वैज्ञानिकों की सलाह से खाद एवं सूक्ष्म पोषक तत्व डालें

ललित शर्मा | जयपुर

किसान खेती की परंपरागत विधियों में नई तकनीक का इस्तेमाल कर उत्पादन बढ़ा सकते हैं। इससे उत्पादकता भी ज्यादा हो सकती है। इसके लिए किसानों को कृषि वैज्ञानिकों या कृषि अधिकारियों की सलाह पर अमल करना चाहिए। कंप्यूटर और मोबाइल के जरिए खेती के नए तरीके जानने के इच्छुक किसानों को भी लगातार इनसे संपर्क में रहना चाहिए। इससे काम करने के तरीकों में गुणात्मक सुधार आने के साथ अच्छी और ज्यादा फसल ले सकते हैं। हालांकि जैविक खेती से फसल की गुणवत्ता में अत्यधिक सुधार होता है, लेकिन उत्पादकता पर असर आता है, क्योंकि मृदा में कई पोषक तत्व कम होते हैं, जिनका असर उत्पादकता पर पड़ता है।

हार्वेस्टिंग : फसल कटाई में नई तकनीक से युक्त हार्वेस्टर्स का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके बाद थ्रेसर का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे समय और श्रम की बचत होगी। वैसे बाजरे की हार्वेस्टिंग हाथों से करना अच्छा माना जाता है।

वागड़ में डेढ़ फीट के पौधे पर आ जाती है देशी भिंडी

बारह महीने होने वाली डूंगरपुर की भिंडी की अच्छी डिमांड

पुनीत चतुर्वेदी | डूंगरपुर

वागड़ की जमीन नकदी फसलों के लिहाज से बेहद उपयोगी है। गरीबी और निरक्षरता दूर कर लोग अब भिंडी की फसल से आमदनी बढ़ाने में लगे हैं। इसकी शुरुआत छोटी-छोटी जमीनों पर खेती से हो रही है। देशी भिंडी के नाम से इसकी अच्छी बिक्री और पैदावार अन्य किसानों को भी प्रोत्साहित कर रही है। भिंडी की फसल वागड़ की आबोहवा में किसी भी मौसम में हो जाती है। वहीं पेशेवर रूप से होने वाली खेती सर्दियों में ही होती है। खास बात यह है कि इसका पौधा सामान्य रूप से 4 फीट का होने के बाद फल देता है, लेकिन यहां डेढ़ फीट के पौधों पर भिंडी लगना शुरू हो जाती है। हर तीसरे दिन फल की तुड़ाई हो जाती है। ज्यादातर महिला किसान थैले में 30-40 किलो भिंडी भरकर लाती हैं। बाजार में 40 रुपए किलो के भाव से बेचकर करीब 1500 रुपए कमा ले जाती हैं। फिर तीसरे दिन आकर इतनी ही कमाई करते हैं। भिंडी बच जाने कड़क हो जाती है या दूसरे दिन तक उसमें कीड़ा लग जाता है।

मृदा जांच : यहां दुर्गापुरा स्थित राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान (रारी) में सहायक प्रोफेसर डॉ. श्वेता गुप्ता का कहना है कि खेती में नई तकनीक की इस्तेमाल करना है तो सबसे पहले मिट्‌टी की जांच करवानी चाहिए। सरकार की ओर से इसकी व्यवस्था है। मृदा का हर 3 साल में परीक्षण करवाना लाभदायक होता है। जांच कराने से मृदा में पोषक तत्वों की अनुलब्धता या कमी का पता चल जाता है। मृदा में पोषक तत्वों की कमी की पूर्ति हर फसल के लिए अलग-अलग होती है। मृदा जांच के बाद कृषि वैज्ञानिक कमी के अनुसार खेत में खाद या फर्टिलाइजर डालने की सलाह देते हैं।

फसल के ज्यादा उत्पादन के लिए खरपतवार पर नियंत्रण करना जरूरी

खेती में फसल को अधिक उपजाऊ बनाने के लिए जरूरी है कि खरपतवार को नियंत्रित किया जाए। इसमें नई तकनीक और वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएं तो फसल की मात्रा बढ़ सकती है। इसके लिए ये तरीके अपनाए जा सकते हैं।

(अ) गहरी जुताई : खरपतवार नहीं पनपे, इसके लिए सबसे पहले खेत को गर्मी के दौरान गहरी जुताई कर छोड़ दें। इससे कीड़े और सूक्षकृमियों के मरने के साथ ही वनस्पति के कई बीज स्वत: ही खत्म हो जाते हैं।

(ब) खुरपी से : खुरपी से खरपतवार हटाना परंपरागत तरीका है। बुआई के 20 से 30 दिन बाद खुरपी से खुदाई कर या खुरचकर खरपतवार हटाई जाती है। किसान स्वयं या श्रमिकों की मदद से इसे हटा सकते हैं।

(स) हर्बीसाइड का इस्तेमाल : खरपतवार हटाने के लिए श्रमिकों की कमी होने पर किसान हर्बीसाइड का इस्तेमाल कर सकते हैं। डॉ. श्वेता गुप्ता का कहना है कि हर खरपतवार के लिए अलग-अलग नाशक होता है। कुछ के लिए बुआई के दो दिन बाद नाशक मिट्‌टी के नमी रहते डालें। कुछ के लिए 20-25 दिन बाद खड़ी फसल में डालना चाहिए।

पौध सरंक्षण : कीट या रोग होने की स्थिति में हर 15 दिन के अंतराल से मेंकोजेब या कारबेंडाजेम से स्प्रे कर सकते हैं। चूसक कीड़े लगने पर एमिडा क्लोरपिड का छिड़काव करना चाहिए। स्प्रे कटाई से एक से डेढ़ माह पहले ही करना चाहिए।

डूंगरपुर के एक खेत में उगाई गई देशी मीठी भिंडी।

रेडी मार्केट : टिफिन सेंटर और रेस्टोरेंट में सबसे ज्यादा डिमांड

भिंडी की सब्जी को लगभग सभी आयु वर्ग के लोग पसंद करते हैं। रेस्टारेंट संचालक और टिफिन सेंटर्स को सर्दियों में कई तरह की सब्जियां मिल जाती हैं, लेकिन इसके बाद और पहले ताजा सब्जी के रूप में केवल भिंडी ही मिलती है। इसलिए रेस्टोरेंट संचालक व टिफिन सेंटर्स से भिंडी की डिमांड ज्यादा होती है।

टुकड़ों में जमीन होने से पेशेवर खेती नहीं : यहां की जमीन भिंडी की खेती के अनुकूल है, पर यहां के किसानों के पास ज्यादा जमीन नहीं है। जमीन एकचक के बजाय टुकड़ों में है। इससे पेशेवर खेती के बारे में ये लोग सोच नहीं पाते।

गोबर की खाद लेते हैं काम : डूंगरपुर में भिंडी रतलाम, अहमदाबाद और कुछ मात्रा में उदयपुर की मंडियों से आती है। स्थानीय स्तर पर कुछ माह से इस फसल के प्रति गरीब आदिवासी व पटेल समाज के लोगों ने रूख शुरु किया है। यहां के किसान परंपरागत गोबर की खाद काम में लेते है, ऐसे में फसल की मिठास बाहर से आने वाली भिंडी से काफी ज्यादा है। थोक व्यापारी सलीम शेख, युनूस, जाहिदा बानो ने बताया कि बाहर की भिंडी केवल नाममात्र की सब्जी है।

बाॅयो फर्टिलाइजर्स : डॉ. गुप्ता का मानना है कि कृषि वैज्ञानिक एन पी के के सूत्र के अनुसार सलाह देते हैं। एन अर्थात नाइट्रोजन की कमी को यूरिया डालकर पूरा किया जा सकता है। पी यानी फास्फोरस की कमी पर डीएपी और के मतलब पोटेशियम की कमी पर न्यूरोटा ए पोटेश खेत में डालने की सलाह दी जाती है। वैसे न्यूरोटा के पोटेश को पोटशियम की कमी होने पर ही डालना चाहिए अन्यथा नहीं। इसके साथ ही माइक्रो न्यूट्रेंट (सूक्ष्म पोषक तत्व) जिंक, सल्फर और आयरन की कमी के अनुसार सूक्ष्म पोषक तत्व डाले जा सकते हैं। इन सूक्ष्म पोषक तत्वों को फर्टिलाइजर्स के साथ डालने से फायदा होता है। इससे बुआई से पहले से पोषक तत्वों के मौजूद रहने से फसल की पौध तक जल्द पहुंच सकते हैं। सूक्ष्म पोषक तत्व सॉलिड और लिक्विड दोनों रूप में उपलब्ध हैं। कई किसान लिक्विड पोषक तत्वों का इस्तेमाल करते हैं, हालाकि अभी तक सरकार की ओर से इस तरह की कोई सलाह जारी नहीं की गई है। इस पर शोध चल रहा है, अब तक के परिणाम सकारात्मक रहे हैं।

पुष्कर से नींबू के 250 पौधे लाकर लगाए हर साल दो लाख रुपए आय की उम्मीद

जोधराज टेलर | चिकारड़ा (चित्तौड़गढ़)

यहां के किसानों का पारंपरिक खेती के साथ स्थाई आमदनी के स्रोत फलोद्यान व बागवानी के प्रति रुझान बढ़ रहा है। कस्बे के मदनलाल खंडेलवाल ने डूंगला मार्ग पर बस्ती के पिछवाड़े अपनी 4 बीघा कृषि भूमि पर बागवानी विशेषज्ञों की सलाह पर पुष्कर से नींबू के 250 पौधे लाकर करीब 4 साल पहले रोपे थे। इनमें तीसरे साल फल आने शुरू हो गए। अब चौथे साल में ये पौधे फूल और फलों से लकदक हो रहे हैं। किसान खंडेलवाल ने बताया कि मई-जून में इन नींबू के पौधों से करीब एक लाख रुपए की आय होने की उम्मीद है। पौधों में साल में दो बार नींबू लगेंगे। पौधे बारहमासी फलदार होने से दूसरे दौर में भी एक लाख रुपए की आमदनी होने की संभावना है। खंडेलवाल ने इन पौधों को सींचने के लिए एक किलोमीटर दूर स्थित जल स्रोत से बगीचे तक पाइप लाइन बिछाई है।

बांसवाड़ा, मंगलवार, 17 अप्रैल, 2018 | 14

जोधपुर में ‘ग्राम’ का आयोजन 23 मई से, मसालों के विकास पर रहेगा फोकस

जयपुर| ग्लोबल राजस्थान एग्रीमीट (ग्राम) का अगला आयोजन जोधपुर में 23 से 25 मई तक होगा। इसमें मसाला संवर्धन और विकास पर फोकस किया जाएगा। इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के ट्रेडर्स के साथ मसाला उत्पादन बढ़ाने पर चर्चा के लिए विशेषज्ञ वैज्ञानिकों को भी बुलाया जा रहा है। कृषि मंत्री डॉ. प्रभुलाल सैनी ने भास्कर को बताया कि पश्चिमी राजस्थान में जीरा, मेथी, ईसबगोल, सौंफ और सावा का उत्पादन देश में सर्वाधिक होता है। इन फसलों को अतंरराष्ट्रीय मार्केट उपलब्ध कराने और विश्व स्तर की ख्याति दिलाने के लिए ग्लोबल ट्रेडर्स को बुलाया जा रहा है। डॉ. सैनी ने बताया कि ग्राम में पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर, जालोर, सिरोही, पाली, बाड़मेर व जैसलमेर से 45 से 50 हजार किसानों को शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। इन किसानों को सामान्य खेती की नवीनतम तकनीक के साथ मसाला उत्पादन में गुणवत्ता लाने व उत्पादकता बढ़ाने की जानकारी दी जाएगी। बाड़मेर में शुगरफ्री पोटाटो, थार के अनार व अन्य उत्पादों की जानकारी दी जाएगी।

भिंडी की फसल में एनपीके एवं सूक्ष्म तत्वों का उपयोग करना होता है लाभकारी


किसान भिंडी की फसल में एनपीके एवं सूक्ष्म तत्वों का उपयोग करें। इससे सही एवं अधिक उत्पादन होगा।


-कुलदीप सिंह शेखावत, जुलियासर, सीकर

इमली के पौधे की तने के भाग को छोड़कर गहरी गुड़ाई करें और उस मिट्टी में एफवाइएम सहित 25 किलो गोबर की सड़ी खाद मिलाकर सिंचाई करें। इससे फल लगना प्रारंभ हो जाएंगे।


-कृषि पर्यवेक्षक के मार्गदर्शन में सूक्ष्म तत्व व दवा का उपयोग करें।

X
किसान खेती में नई तकनीक के इस्तेमाल व वैज्ञानिकों की सलाह से बढ़ा सकते हैं उत्पादन
Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..