26 साल बाद खड़गदा में मोरारी बापू की नौ दिवसीय रामकथा आज से, निकलेगी कलश-पोथी यात्रा

Dungarpur News - डूंगरपुर. खड़गदा में वर्ष 1993 में काली शॉल कंधे पर डालकर प्रवेश करते हुए आध्यात्मिक चिंतक मोरारी बापू उनके साथ सफेद...

Bhaskar News Network

May 18, 2019, 10:06 AM IST
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डूंगरपुर. खड़गदा में वर्ष 1993 में काली शॉल कंधे पर डालकर प्रवेश करते हुए आध्यात्मिक चिंतक मोरारी बापू उनके साथ सफेद कपड़ों में गोवर्धनलाल विधाविहार के सचिव स्व. पंडित शिवनारायण दीक्षित।

हर रोज तीन बार यज्ञ करते हैं बापू

मोरारी बापू का पूरा जीवन आध्यात्म को समर्पित हैं। यह हर रोज तीन बार यज्ञ करते हैं। कथा के दौरान रोज सुबह छह बजे उठना। नित्य कर्म के बाद पूजा और यज्ञ साधना। सुबह के ब्रेकफास्ट में सिर्फ एक दो फलों का सेवन और इसके बाद 9.20 को कथास्थल की ओर निकलते हैं। कथा के बाद दोपहर दो बजे कुटिया में पहुंचते है। यहां बेहद सादा भोजन दो चपाती के साथ लेते हैं। करीब दो घंटे के विश्राम बाद शाम पांच बजे श्रद्धालुओं के बीच पहुंचते हैं। यहीं सबके साथ संध्या पूजन होता है। रात को मंदिर में दर्शन के बाद थोड़ा सा अल्पाहार लेते हैं। हां, कई बार नौ दिन की कथा के दौरान दोपहर के भोजन के लिए आस-पास किसी के मकान में भी अचानक पहुंच जाते है और उस परिवार में जो भी भोजन उपलब्ध होता है, उसको ग्रहण करते हैं।

मोरारी बापू रहेंगे पर्णकुटी में

विद्या विहार परिसर में मोरारी बापू के आवास के लिए पर्णकुटी बनाई गई है। वो किसी के निवास पर भौतिक सुख-सुविधा से दूर आध्यात्म के साथ साधारण रहना पंसद करते हैं। इसके लिए विशेष पर्णकुटी बनाई गई है। इसके साथ ही उन्हें एकांत भी पंसद है। इसलिए उसकी सुरक्षा के लिए भी पुलिस विभाग की ओर से प्रबंध किए गए हंै।

प. दीक्षित का सपना होगा पूरा: श्री गोवर्धन विद्या विहार के सचिव रहे प. शिवनारायण दीक्षित के बड़े प्रयासों और तपस्या के बूते मोरारी बापू की रामकथा की स्वीकृति मिली है। प. दीक्षित के महाप्रयाण के बाद उनके रामकथा आयोजन के सपने को पूरा करने कमान प. हितेश नारायण दीक्षित ने संभाली और प. शिवनारायण दीक्षित की ढाई दशक की तपस्या शनिवार को आकार लेने जा रही है। यह भी उल्लेखनीय है कि प. शिवनारायण दीक्षित ने श्री गोवर्धन विद्या विहार के माध्यम से इस क्षेत्र में संस्कृत और संस्कृति के संरक्षण को लेकर गंभीर प्रयास किए और आज जनजाति क्षेत्र में विद्या विहार संस्कृत और संस्कृति के लिए संजीवनी बन चुकी है। इसी भाव के चलते बापू दीक्षित परिवार से प्रभावित है और यहां के संस्कार और संस्कृति से खासे प्रभावित हैं।

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