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डूंगरपुर और बांसवाड़ा में करीब 40 हजार लोग जो अन्य राज्यों, देशों में काम करते हैं, वे भी वापस आए

भास्कर संवाददाता | बांसवाड़ा होली के अवसर पर हमारे वागड़ में पूरे संभाग में सबसे ज्यादा 8 परंपराएं निभाई जाती है।...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 01, 2018, 02:55 AM IST

डूंगरपुर और बांसवाड़ा में करीब 40 हजार लोग जो अन्य राज्यों, देशों में काम करते हैं, वे भी वापस आए
भास्कर संवाददाता | बांसवाड़ा

होली के अवसर पर हमारे वागड़ में पूरे संभाग में सबसे ज्यादा 8 परंपराएं निभाई जाती है। बरसों पुरानी इन परंपराओं में शामिल होने के लिए न केवल स्थानीय वरन, काम की तलाश में पलायन कर गए प्रवासी लोग भी अपने घर लौटते है। परंपराओं के आयोजन भी ऐसे कि हरेक में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। पूरा वागड़ होलीमय हो जाता है।

परंपराओं को जीवित रखने में हमारा वागड़ पूरे प्रदेश में एक उदाहरण है। उदयपुर संभाग में भी हम होली के आयोजनों में सबसे आगे हैं। बीकानेर, अजमेर, जोधपुर जैसे बड़े शहरों में भी होली के अवसर पर इतने आयोजन नहीं होते। आयोजनों में शामिल होने के लिए लोगों में उत्साह और अपनापन इतना है कि चाहे दीवाली पर घर नहीं पहुंचे लेकिन होली पर तो घर आना ही है। फिर शुरू होती है होली की ऐसी मस्ती कि घरों से दूर रहने का गम भी भूल जाते हैं।

लोग रोजगार के लिए गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश सहित दूसरे देशों जैसे कुवैत,दुबई, कतर, बेहरीन,अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया,न्यूजीलैंड भी पलायन करते हैं। लोग अपनी सुविधा के अनुसार बसों, जीपों,मिनी बसों से घरों को लौट रहे हैं। कई गांवों के हालात तो ऐसे हैं,जहां पूरा परिवार ही बाहर के राज्यों में जाकर काम कर रहा है। ऐसे में पूरे साल भर उनके मकान पर ताले रहते है जो होली के दिन ही खुलते हैं।

होली पर सबसे ज्यादा परंपराएं केवल हमारे वागड़ में, इसलिए घर लौटे प्रवासी, कई घरों के ताले भी इसी त्योहार पर खुलते हैं

घर पहंुंचने की जल्दी, जहां जगह मिली बैठ गए

ट्रेवल्स संचालकों ने बताया कि पिछले तीन दिनों से मुंबई, सिलवासा, वापी, सूरत, बड़ौदा, अंकलेश्वर, अहमदाबाद, नवसारी, हिम्मतनग, आणंद, भावनगर क्षेत्रों से लोग लौट रहे हैं। रोडवेज और निजी बस यात्रियों से भरी हुई आ रही है। बांसवाड़ा में रोजाना 40 से 50 और डूंगरपुर में 30 से 40 वाहनों में लोगों के आने का क्रम बुधवार रात तक बना रहा। अधिकतर बस ओवरलोड है। मुंबई के दादर,गोरे गांव, मनोहर में बांसवाड़ा, सज्जनगढ़, डूंगरा, कुशलगढ़, गांगड़तलाई, मोनाडूंगर, परतापुर, बागीदौरा, आनंदपुरी, गढ़ी, घाटोल, पालोदा, लोहारिया, दानपुर, तलवाड़ा, अरथूना, छाजा, सागवाड़ा, डूंगरपुर,सीमलवाड़ा, आसपुर,चीखली सहित विभिन्न क्षेत्रों में आने वाले लोगों की संख्या काफी अधिक है। ट्रावेल्स संचालक महावीर बोहरा ,मुजफ्फर अली, महेंद्र अग्रवाल, विनोद अग्रवाल, जगदीश ने बताया कि रश इतना है कि लोग सीट नहीं मिलने पर खड़े रह कर भी जल्दी घर पहुंचने की जुगत में रहते हैं। रोडवेज डिपो के महाप्रबंधक काडूराम ने बताया कि होली के मद्देनजर मध्यप्रदेश के खंडवा, बुरहानपुर,इंदौर,धार,आेंकारेश्वर की ओर से आने वाली बसों में 26 फरवरी को 73 प्रतिशत, 28 को 68 प्रतिशत रहा। गुजरात की ओर से 17 बसों के अपडाउन के दौरान यात्री भर अधिक रहा। डूंगरपुर रोडवेज डिपो की ओर से बसों की संख्या 18 से बढ़ाकर 20 कर दी है

इन आयोजनों में शामिल होने का उत्साह

धूलंडी की शाम को गढ़ भेदन

होली से लेकर रंग पंचमी तक गैर नृत्य

रंग पंचमी पर त्रिपुरा सुंदरी मंदिर परिसर में हजारों जनजाति वर्ग के लोग गैर नृत्य करते हैं।

ओबरी में फूतरा पंचमी पर खजूर के पेड़ पर चढ़ का शौर्य प्रदर्शन।

भीलूड़ा में पत्थरों की राड़।

सागवाड़ा में टमाटर की राड़।

शिवपुरा और कोकापुर में दहकते अंगारों पर नंगे पांव चलने की परंपरा।

ढोल कुंडी की थाप पर कंडों की राड।

बच्चों से पहले रूई को ढूंढाते हैं, इसी से दशामाता व्रत के धागे तैयार होते हैं, 10 दिन बाद महिलाएं धारण करती हैं अपने गले में

बांसवाड़ा| अब तक आपने होली पर नौनिहाल बच्चों को ढूंढाते हुए देखा होगा, लेकिन वागड़ की परंपरा में बच्चों से पहले रूई को ढूंढाते हैं। बाद में इसी रूई से दशामाता व्रत का धागा तैयार होता है, जिसे होली के 10 दिन बाद महिलाएं अपने गले में धारण करती हैं। वागड़ की यह परंपरा है, जिसे हर साल पालन किया जाता है।

होली के दूसरे दिन जब बच्चों को ढूंढ़ाया जाता है, उसके ठीक पहले सभी ग्रामीण गांव के चौराहे पर एकत्रित होते हैं। वहां पर गांव में ही रहने वाले मामा-भांजे को आमने-सामने बैठाया जाता है। गांव का पंडित उन्हें तिलक कर हाथ में रूई देता है। बीच में होलिका दहन की आग रखी जाती है।

इस पर धूप और नारियल के टुकड़े डालते हैं। फिर मामा और भांजा दोनों आपस में 10 बार रूई को ढूंढाते हैं। बाद में इसी रूई से दशामाता व्रत के लिए सात गांठों वाला धागा तैयार होता है, जिसकी पूजा होली के 10 दिनों बाद आने वाले दशामाता व्रत के दिन बड़ की पूजा करने के बाद महिलाएं धारण करती हैं।

भास्कर विशेष

बच्चों ने मनाई तिलक होली, हम भी मनाएं

होली की मस्ती गुुरुवार से शुरू होगी लेकिन शहर के स्कूलों में एक दिन पहले ही बच्चों ने तिलक होली से कर दिया आगाज।

यह है कारण

ऐसा माना जाता है कि ढूंढाई हुई रूई से बनने वाले धागे में होलिका का आशीर्वाद ओर समृद्धि का वास होता है। जब कोई महिला इस धागे को अपने गले में धारण करती है तो पूरे वर्ष तक घर की दशा सुधरी हुई रहती है। यह काम मामा-भांजा करते हैं। यदि किसी गांव में मामा-भांजा नहीं मिलते हैं तो पड़ोस के गांव से यह परंपरा निभाकर रूई को लाया जाता है। हालांकि कुछ गांव ऐसे भी हैं, जहां पर होलिका के चारों ओर रूई को ढूंढाया जाता है। अलग-अलग गांवों में अलग परंपराएं बनी हुई हैं।

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