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जंगल में न चला जाए बेटा, इसलिए 11 साल से बांध रखा है खूंटी से

Dainik Bhaskar

Feb 09, 2018, 03:05 AM IST

Ghatol News - संजय बसेर/प्रियंक भट्ट | बांसवाड़ा 16 साल के इस युवक ने कभी किसी से झगड़ा नहीं किया और न ही कभी किसी को मारा। फिर भी...

जंगल में न चला जाए बेटा, इसलिए 11 साल से बांध रखा है खूंटी से
संजय बसेर/प्रियंक भट्ट | बांसवाड़ा

16 साल के इस युवक ने कभी किसी से झगड़ा नहीं किया और न ही कभी किसी को मारा। फिर भी उसे हरदम जानवरों की तरह खूंटे से बांधे रखा जाता है। वह भी एक-दो दिन से नहीं, बल्कि बीते 11 सालों से। यह जानकर आप भी स्तब्ध रह गए होंगे, लेकिन यह सच है।

चडला ग्राम पंचायत के भैहपाड़ा नरोतों की गोजद्ध में पहाड़ियों की तलहटियों में बीते 11 सालों से विजयपाल निनामा चारपाई पर कुछ इसी तरह खूंटे से बंधकर जिंदगी गुजारने पर मजबूर है। विजय न कभी खाना मांगता है और न कभी कोई और चीज। उसे खिलाने के लिए भी घर के किसी व्यक्ति को खाना पड़ता है, ताकि विजय उसे देख खाने के लिए इशारा करे। भले ही विजयपाल के पैर खूंटे से बांध रखे हों, फिर भी उस पर नजर रखने के लिए घर के किसी न किसी सदस्य को हरदम रहना पड़ता है। इसी तरह कैद में विजयपाल ने और उसकी फिक्र में परिजनों ने तनाव में 11 साल बिता दिए। परिजनों को किसी बड़े अस्पताल में इलाज कराने पर विजयपाल के ठीक होने की उम्मीद है, लेकिन इलाज के लिए रुपए नहीं होने का उन्हें मलाल है।

विजय का जब जन्म हुआ तो परिवार में खुशी की लहर छा गई थी। शुरुआत में तो परिजन उसे सामान्य मानते थे, लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया, उसकी हरकतें परिजनों को अजीब लगी। विजय 2 साल का हुआ तो इधर-उधर चला जाता। चूंकि घर के पास ही जंगल है, इसलिए परिजनों के विजयपाल के जंगल में चले जाने पर किसी अनहोनी का डर सताने लगा। उम्र के साथ विजयपाल की हरकतें और भी बढ़ने लगी। इससे चिंतित परिजनों ने 5 साल की उम्र में पहलीबार खूंटे से बांध दिया था। उसकी हरकतों में सुधार नहीं होने पर परिजन समझ गए कि वह मानसिक बीमार है।

11 सालों से खूंट से इसी तरह बांंधे रखा जा रहा है विजयपाल को।

बेटे का इलाज नहीं करा पाने का मलाल

विजयपाल के पिता पंकज कुमार बताते हैं कि बचपन में विजय की असामान्य हरकतें देख उसे एमजी अस्पताल ले गए थे, लेकिन उम्र के साथ विजय और बीमार होता गया। बेटे को ठीक कराने के लिए भोपों से लेकर कुछ दवाखानों में भी ले गया, लेकिन राहत नहीं मिली। उस वक्त कर्ज लेकर इलाज के लिए जैसे-तैसे करके 35 हजार का जुगाड़ किया था, फिर भी बेटा ठीक नहीं हो पाया। ये कहते हुए आहत पिता पंकज की आंखें भर आई। पंकज ने कहा कि उसे उम्मीद है कि अगर किसी बड़े अस्पताल में उनके बेटे का इलाज कराया जाए तो वह सामान्य हो सकता है, लेकिन रुपए नहीं हो पाने से ऐसा नहीं कर पाने का उन्हें ताउम्र मलाल रहेगा। बेटे को इस तरह खूंटे से बांधना उन्हें भी अच्छा नहीं लगता, लेकिन ऐसा नहीं करने पर उसके जंगल में चले जाने का डर बना रहता है।

प्रशासन करे मदद तो ठीक हो सकता है भाई

विजयपाल के बड़े भाई 18 वर्षीय रामचंद्र का कहना है कि प्रशासन अगर उनकी मदद कर बड़े अस्पताल में उनके भाई का इलाज कराए तो वह ठीक हो सकता है। विजयपाल की 3 साल की बहन पायल भी अपने भाई को इस हालत में देख दुखी है, लेकिन वह चाहकर भी उसकी कोई मदद नहीं कर पा रही। पंकज कुमार किसान है, लेकिन खेती भी उतनी नहीं है कि जिससे वह अपने परिवार का ठीक से गुजारा कर पाए।

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