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आज बांसवाड़ा बंद का आह्वान, शहर में निकालेंगे वाहन रैली

भास्कर संवाददाता | बांसवाड़ा एससी-एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर करने की...

Danik Bhaskar | Apr 02, 2018, 04:35 AM IST
भास्कर संवाददाता | बांसवाड़ा

एससी-एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर करने की मांग के समर्थन में भारत बंद के आह्वान पर शहर में अनुसूचित जाति-जनजाति क्रांति मोर्चा ने सोमवार को बांसवाड़ा बंद का आह्वान किया है। बंद के दौरान शहर में वाहन रैली निकाली जाएगी।

इसे लेकर मोर्चा के बैनर तले एससी-एसटी समाज के विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों की रविवार को बैठक हुई। एससी-एसटी छात्रसंघ के संभागीय अध्यक्ष मनोहर खड़िया ने बताया कि बैठक में तय किया गया कि रैली एमजी अस्पताल चौराहा से रवाना होकर शहर के मुख्य मार्गों से होते हुए कॉलेज मैदान पहुंचेगी, जहां सभी का आयोजन किया जाएगा। बैठक में आवाम संरक्षक हेमंत राणा, प्रकाश बामणिया, अरविंद डामोर, मुकेश मईड़ा, कॉलेज छात्रसंघ अध्यक्ष दिनेश निनामा, मनोज डामोर, दिनेश पटेल, पार्षद सीता डामोर, देवबाला राठौड़, लक्ष्मीनारायणसिंह, अशोक रायकवाल, बलवंत वसीटा, विनोद परमार समेत विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने संबोधित किया। बंद को सफल बनाने के लिए सभी कार्यकर्ताओं को सुबह 6 बजे नगर परिषद उद्यान में एकत्र होने के निर्देश दिए गए।

शहर में बंद के समर्थन के लिए युवाओं ने रविवार दोपहर में रैली निकाली।

संगठनों ने दिया समर्थन

एसटीएससी संगठन की ओर से भारत बंद के तहत विभिन्न संगठनों ने समर्थन देने की घोषणा की है। मीणा समाज सुधार संस्थान घाटोल के अध्यक्ष रतनसिंह बरगोट,महामंत्री वीरसिंह रावत ने रविवार को आयोजित बैठक में बांसवाड़ा बंद को समर्थन देने की घोषणा की है। आदिवासी किसान संघर्ष समिति के जिलाध्यक्ष पूर्व मंत्री दलीचंद मईड़ा ने भी समर्थन दिया है।

इसलिए है विरोध

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 का बेजा इस्तेमाल होने की बात स्वीकारते हुए 21 मार्च को सुनाए फैसले में इस एक्ट में वर्णित प्रारूप अनुसार अब तत्काल गिरफ्तारी और एफआईआर दर्ज नहीं करने की व्यवस्था दी। साथ ही निर्देश दिए कि एक्ट के दुरुपयोग होने की शिकायत पर एफआईआर से पहले डीएसपी स्तर के अधिकारी से जांच करवाई जाए। साथ ही सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी से पहले उसके उच्चाधिकारी से अनुमति लेने समेत जमानत पर रिहाई संबंधित निर्देश भी दिए गए। इससे एक्ट निष्प्रभावी होने दलितों और आदिवासियों के लिए न्याय पर नकारात्मक असर होने की आशंकाएं उपजी। यह भी चर्चा बनी कि इस कानून के सख्त प्रावधानों को नरम करने से उत्पीड़न में इजाफा होगा।