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बांसवाड़ा भास्कर

एक संतुलित मन के बराबर कोई तपस्या नहीं है। संतोष के बराबर कोई खुशी नहीं है। लोभ के जैसी कोई बीमारी नहीं है। दया के...

Dainik Bhaskar

Feb 22, 2018, 05:00 AM IST
एक संतुलित मन के बराबर कोई तपस्या नहीं है। संतोष के बराबर कोई खुशी नहीं है। लोभ के जैसी कोई बीमारी नहीं है। दया के जैसा कोई सदाचार नहीं है। -चाणक्य

बांसवाड़ा, गुरुवार, 22 फरवरी, 2018

कुशलगढ़
फाल्गुन, शुक्ल पक्ष-7, 2074

लड़का- पापा, प्यार एक वायरस है। पिता- और ये दरवाजे के पीछे रखा लट्ठ एन्टीवायरस है। कहे तो अब तेरा सिस्टम स्कैन कर दूं।

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