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राम सबमें समाया है, जग में पराया कोई नहीं - हरिओमदास

घाटोल| सरस्वती विद्या मंदिर स्कूल उदाजी का गढ़ा में चल रही श्रीराम कथा में गुरुवार को कथावाचक संत हरिअोमशरणदास...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 08, 2018, 03:05 AM IST

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    घाटोल| सरस्वती विद्या मंदिर स्कूल उदाजी का गढ़ा में चल रही श्रीराम कथा में गुरुवार को कथावाचक संत हरिअोमशरणदास महाराज ने कहा कि राम कथा कहने से हम ज्ञानी हो जाते हैं। राम को माने तब ज्ञानी होंगे। मां बाप की माने तब हमारा कल्याण होगा। दुनिया की नजरों में अच्छे बनने से क्या, हमारे रामजी की नजर में अच्छे बन जाओ तो दोनों लोक सुधर जाएंगे।

    संत हरिओमशरणदास महाराज ने कहा कि हम चित्र नहीं चरित्र के उपासक बनें। भक्ति और सत्संग से ज्ञान आता है और ज्ञान से चरित्र का निर्माण होता है। अच्छे काम बार-बार करें, लगातार करें, तब तक करें, जब तक वह आदत न बन जाए। महाराज ने कहा कि मदिरा संबंधों में शुचिता को छीनती है। इसके सेवन से मन व प्राण का संतुलन बिगड़ता है। धन का अधिक होना अपव्यय की प्रवृति बढ़ाता है। धन को भोगें, पर पात्र लोगों में उसे बांटे। दान की यहीं सही विधि है।

    घाटोल के सरस्वती विद्या मंदिर स्कूल में श्रीराम कथा करते महंत हरिओमशरणदासजी और कथा के दौरान व्यासपीठ की आरती उतारते श्रद्धालु।

    ईष्ट के चिंतन से मिलता है अपार आनंद

    मानव सांसारिक वस्तुओं में सुंदरता ढूंढता है। सुंदर और भोग प्रदान करने वाली वस्तुओं को एकत्रित कर प्रसन्न होता है। भगवद्प्रेमी अपने ईष्ट के स्वरूप चिंतन में ही आनंदित होता है। भगवान सर्वत्र व्याप्त हैं, लेकिन उन्हें इन भौतिक आंखों से देखा नहीं जा सकता है। उन्हें देखने के लिए स्वच्छ हृदय और पवित्र मानसिक आंखें चाहिए। मानव स्वार्थ को इंगित करते हुए कहा कि हम भगवान को सिर्फ मुसीबत में याद करते हैं। हमें सुख व दुख दोनों समय राम को स्मरण करना चाहिए। गुरुवार को कथा में सुग्रीव मित्रता, सीता खोज, लंका दहन, हनुमान चरित्र, लंका कांड की कथा विस्तार से सुनाई। शाम को भगवान को भोग लगाया, बाद में व्यासपीठ की आरती उतारी।

    कथा में सुग्रीव मिलन प्रसंग सुनाया

    महाराज ने कथा में सुग्रीव मिलन प्रसंग सुनाते हुए कहा कि सुग्रीव के मन में संकोच था कि क्या श्रीराम मुझसे प्रीति करेंगे। लेकिन

    तभी हनुमानजी ने अग्नि को साक्षी मानकर प्रतिज्ञापूर्वक उनकी मित्रता करवा दी। फिर लक्ष्मण ने सुग्रीव को सारी बात बताई, सुग्रीव ने नेत्रों में जल भरकर विश्वास दिलाया की हे नाथ! माता जानकीजी मिल जाएंगी।

    गुरु महिमा: महाराजश्री ने बताया कि गुरु शब्द का अभिप्राय अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाना है। जिस व्यक्ति का कोई गुरु नहीं होता, वह सही मार्ग पर नहीं चल सकता है। अत: प्रत्येक को जीवन में गुरु अवश्य बनाना चाहिए।

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