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घाटोल रेंज के 30 हैक्टेयर वनक्षेत्र में ग्रामीणों का कब्जा

Ghatol News - प्रियंक भट्‌ट/हेमंत पंड्या | चिड़ियावासा पिछले 3 साल में पैंथर के 16 हमले हुए हैं। इनमें 5 पैंथर की मौत हो चुकी हैं।...

Dainik Bhaskar

Apr 14, 2018, 03:45 AM IST
घाटोल रेंज के 30 हैक्टेयर वनक्षेत्र में ग्रामीणों का कब्जा
प्रियंक भट्‌ट/हेमंत पंड्या | चिड़ियावासा

पिछले 3 साल में पैंथर के 16 हमले हुए हैं। इनमें 5 पैंथर की मौत हो चुकी हैं। कारण साफ है कि हमारा दखल जंगल में बढ़ रहा है। पैंथर भोजन की तलाश में हमले कर रहे हैं। चार दिन पहले एक पैंथर की मौत के बाद भास्कर ने इस संबंध में पड़ताल की। घाटोल रेंज के कुवानिया और झांतला पंचायत से सटे जंगल में 150 से ज्यादा परिवार बसेरा कर रहे हैं। 22 हजार हैक्टेयर में फैले इस जंगल में अब तक 30 हैक्टेयर से ज्यादा इलाके में इंसानी दखल बढ़ चुका है। इसके पीछे सीधे तौर पर तो माही विस्थापितों का कब्जा बताया जा रहा है, लेकिन झोपड़ों की बढ़ती तादाद के पीछे दो गांवों के बीच जंगल पर हक की लड़ाई भी एक वजह बताई जा रही है। हालत यह है कि इस घने जंगल में पहले सड़क किनारे पर भी थोड़ी देर ठहरने पर कोई वन्यजीव दिखाई पड़ जाता था, लेकिन अब यहां सिर्फ इंसानी हलचल ही नजर आती है। जंगल में झोपड़े बनाने के लिए अब तक सैकड़ों पेड़ काटे जा चुके हैं। लेकिन, विवादित मसला देख वन विभाग और प्रशासन भी दखल नहीं दे रहा। इस जंगल में साल 2011 में कुछ विस्थापित आकर रहने लगे। ढाई साल पहले दोनों ही गांवों के ग्रामीणों के बीच भी टकराव के हालात बन पड़े। वर्चस्व की इस लड़ाई में दोनों गांवों के लोग अपने घर छोड़कर वन भूमि पर झोपड़ियां बनाने में जुट गए और मौके पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई कर करीब डेढ़ सौ झोपड़ियां बना दी। यह सिलसिला कई दिनों तक जारी रहा, लेकिन जिम्मेदार वन अधिकारी और राजस्व विभाग ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। मामला और तूल पकड़ता दिखा तो खुद के बचाव के लिए वन अधिकारियों ने विवादित स्थल का सर्वे कराने वन और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम बनाने तत्कालीन कलेक्टर को पत्र लिखा, लेकिन ढाई साल बाद भी नतीजा कुछ नहीं निकल पाया।

पैंथर के इलाके में इंसानों का बसेरा, इसलिए 3 साल में 16 हमले

5 पैंथर का मूवमेंट, जरख भी बड़ी संख्या में

जंगल में भले ही इंसानी बसेरा हो चुका है, लेकिन रात होते ही जानवरों के हमले का खतरा बना हुआ है। यहां अक्सर रात में पैंथर कई बार मवेशियों को अपना शिकार बना चुका है। ग्रामीणों को डर है कि कहीं वन्यजीव किसी इंसान पर हमला न कर दे। वहीं जंगल में लगातार इंसानी इस्तक्षेप बढ़ने से वन्यजीवों पर भी इसका असर पड़ रहा है। बहुतायत में दिखाई देने वाले वन्यजीव अब कभी-कभार ही नजर आते हैं। वन अधिकारियों के अनुसार इस जंगल में 4 से 5 पैंथर देखे गए हैं। इसके अलावा जरख और नील गायों का बड़ा झुंड भी है।

बिना हक पत्र लिए जंगल में रहना अवैध

वन अधिकार अधिनियम के तहत कोई भी अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति 13 दिसंबर, 2005 से पहले से वनक्षेत्र में काबिज है या इसके अलावा दूसरी जाति व्यक्ति 13 दिसंबर, 2005 से पहले 75 साल या 3 पीढ़ी से काबिज है और उसकी आजीविका उस पर निर्भर है तो वह वन हक पत्र के पात्र हैं। इस हक पत्र मिलने से वह वनभूमि पर काबिज हो सकता है, लेकिन कोई नया निर्माण नहीं कर सकता।

वनभूमि में हक को लेकर विवाद

रेंजर गोविंदसिंह रजावत बताते हैं कि दोनों गांवों के बीच वनभूमि पर हक काे लेकर विवाद था। जिसके बाद तरमीन कराकर मामला सुलझा दिया था। मौजूदा काबिज लोग माही विस्थापित हैं जो साल 2011 से कब्जा किए हुए हैं। इनके पास हकपत्र भी नहीं है। इनकी आड़ में कुछ लोगों ने भी झोपड़े बनाए हैं। इस मामले को लेकर पहले भी विभाग और प्रशासन को पत्र के जरिये अवगत करा चुके हैं।

इस तरह फैला है जंगल (हैक्टेयर में)

घाटोल 20165.60

बागीदौरा 15476050

बांसवाड़ा 30981.80

डूंगरा 8814.570

गढ़ी 8335.740

कुशलगढ़ 16925.298

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