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उमराखाल गांव में कुएं से पैंथर का शव निकालती टीम।

बकरी का शिकार करने बाड़े में घुसा पैंथर, सुबह कुएं में सिर फटा शव मिला, 3 साल में ऐसे ही 16 हमलों के बाद 5 पैंथर मृत मिले...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 11, 2018, 03:55 AM IST

उमराखाल गांव में कुएं से पैंथर का शव निकालती टीम।
बकरी का शिकार करने बाड़े में घुसा पैंथर, सुबह कुएं में सिर फटा शव मिला, 3 साल में ऐसे ही 16 हमलों के बाद 5 पैंथर मृत मिले


उमराखाल गांव में कुएं से पैंथर का शव निकालती टीम।

हमलों में 17 जानवरों का शिकार

बीते 3 सालों में पैंथर ने 16 बार हमले कर 8 गाय, 7 बकरियां, और 2 बैल को अपना शिकार बना डाला। वहीं 8 इंसान भी इनके हमले में जख्मी हो चुके हैं। 21 अप्रैल, 2014 को कथेरियापाड़ा में पैंथर ने हमला कर 2 युवकों, जुलाई, 2017 में आंबापुरा के साकड़ीनाल गांव में पैंथर हमले में एक महिला और पुरुष गंभीर घायल हो गए थे। इससे कुछ दिन पहले गनोड़ा के बोरदा गांव में पैंथर ने एक किशोरी पर हमला किया था। जिस बचाने आए 3 और लोग जख्मी हो गए थे।

दो पैंथरों को लोगों ने मारा

साल 2010 से 2017 के बीच 59 ऐसी घटनाएं हुई है जब पैंथर जंगल से बाहर आए और इंसानों से उनका संघर्ष हुआ या फिर वह मृत मिले। 2 पैंथर को इंसानों ने मार डाला जबकि 5 पैंथर मृत मिले। वहीं पैंथर के हमले से 2 इंसानों की भी मौत हुई है। पैंथर के आबादी इलाकों में घुसपैठ की बढ़ती घटनाओं और उन पर हो रहे हमलों को देखते हुए सरकार ने उन्हें बचाने सभी जिलों से पैंथर प्रभावित क्षेत्रों की जानकारी मांगी थी। सहायक वन संरक्षक शैदा हुसैन बताते है कि विभाग की ओर से भी पैंथर रिर्जव क्षेत्र के लिए प्रस्ताव बनाकर भिजवाए गए है। बांसवाड़ा के गढ़ी के भाभाकुआं वनक्षेत्र, भापौर और उमजला पठारा ऐसे जंगल है जहां पैंथर रिजर्व क्षेत्र घोषित किया जा सकता है।

तीन साल में पांच पैंथरों के शव, कारण अभी भी संदिग्ध

13 दिसंबर 2015 : घाटोल के खेरड़ीपाड़ा में 2015 में नारायण के कुएं में पैंथर मृत मिला था।

03 मार्च 2016 : आसन के एक खेत में पैंथर मृत मिला। भूख से मौत की आशंका जताई।

25 दिसंबर 2017: भापौर के जंगल में भी 3 दिन पुराना पैंथर का सड़ा-गला शव मिला था।

29 जनवरी 2018 : लोहारिया के हिम्मतसिंह का गढ़ा गांव के एक बाड़े में फंसा मिला।

इसलिए बन रहे शिकार

1. शिकार की तलाश में घुसा, लोगों ने मार डाला

जून, 2017 में अरथूना के लालपुरा आबादी बस्ती में पैंथर घुस आया। पैंथर ने हमला कर 3 युवकों को घायल कर दिया। इससे गुस्साए लोगों ने पैंथर को घेर लठ से वार कर मार डाला।

2. इलाका घटा, आपसी संघर्ष से मौत : अवैध कटाई और जंगलों में आबादी के बढ़ने से वनक्षेत्रों का दायरा घटा। हालात यह होने लगे की वन्यजीवों के बीच आपसी संघर्ष बढ़ा। जनवरी, 2017 में गढ़ी के भागतोल जंगल में वर्चस्व की लड़ाई में एक पैंथर की मौत हो गई थी।

3. फसलों को बचाने जहर देने से 15 मोर मारे गए : कुछ साल पहले फसलों को राष्ट्रीय पक्षी मोर से बचाने जहरीले दाने डाले गए थे। जिसे चुगने से 15 मोरों की मौत हो गई थी।

मुआवजा राशि का भी है प्रावधान

श्रेणी राशि

इंसान की मौत 4 लाख

स्थाई अयोग्य 2 लाख

अस्थाई अयोग्य 40 हजार

भैंस व बैल की मौत 20 हजार

गाय की मौत 12 हजार

श्रेणी राशि

बछड़े की मौत 04 हजार

बकरे या बकरी 02 हजार

ऊंट की मौत 20 हजार

खच्चर की मौत 20 हजार

(जैसा विभाग में दर्ज है)

भास्कर मुद्दा

खतरे में पैंथर

रिजर्व क्षेत्र के लिए तत्परता से पहल करनी होगी

सागवान बाहुल्य जंगलों से प्रदेश में अपनी विशेष पहचान रखने वाले बांसवाड़ा जिले में पैंथर के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। बीते 8 सालों में हमने 10 पैंथर खो दिए हैं। इसके अलावा 10 से ज्यादा जरख की सड़क हादसों में मौत हो चुकी है। हालांकि बीते सालों में जिले में पैंथर कुनबा जरूर बढ़ा लेकिन हाल ही में जिस तरह इनकी मौतें हो रही है यह बेहद चिंताजनक है। महज 72 दिनों में हादसों में 2 पैंथर और 2 जरख मारे जा चुके हैं। यह तो महज वन विभाग में दर्ज आंकड़े हैं जबकि ऐसे कई मौतें भी हैं जो जंगल के भीतर से बाहर नहीं आ पाते।

वन्यजीवों के साथ हो रहे इन हादसों का मूल कारण इनके लिए अभयारण्य नहीं होना और नियमों को धत्ता बताते हुए वन्य-क्षेत्रों के निकट बसाई जा रही आबादी है। इसी का परिणाम है कि विगत कुछ महीनों वन्यजीव खाने की तलाश में आबादी क्षेत्र में पहुंच रहे हैं। जिससे आए दिन इंसान और वन्यजीवों के बीच संघर्ष के हालात पैदा हो रहे है।

कुछ मामलों में भूखे और आबादी से त्रस्त जीवों ने इंसानों को घायल कर दिया तो कुछ में भड़के ग्रामीणों ने जीवों की जान ले ली। ऐसे में इनकी मौतें रोकने के लिए बेहद जरूरी है कि बांसवाड़ा में पैंथर रिजर्व क्षेत्र घोषित कर संरक्षित किया जाए। इसका वन विभाग प्लान भी बना चुका है, लेकिन राजनीतिक इच्छा शक्ति नहीं होने से इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका।

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