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नहर में लाशों का ढेर: चार जिलों में इंदिरा गांधी नहर में 7 साल में 1383 शव मिले, सिर्फ 191 की ही पहचान, रहस्य बनी मौतें
राजस्थान से लगते पंजाब बॉर्डर से जैसलमेर के मोहनगढ़ तक 649 लंबी इंदिरा गांधी नहर में 7 साल में मिली 1383 लोगों की लाशों में से 1192 लोगों की मौत रहस्य बन कर ही रह गई है। लाशें उगलती नहर में इन लोगों की मौत के बाद मिले शवों की पहचान तक नहीं हुई है। सड़ी-गली और कटी-फटी होने से 90 फीसदी शवों की शिनाख्त तक नहीं हुई। मिलने वाले शवों में हत्या थी या फिर आत्महत्या, इसके राज नहर के पानी में ही डूब गए हैं।
पुलिस की ओर से इन लाशों की शिनाख्त के भी कोई सार्थक प्रयास नहीं होते हैं। नहरी अधिकारी या कई किसान शव को देखने के बाद भी पुलिस को सूचना नहीं देते हैं। वे शव को पानी में ही आगे सरका देते हंै। इंदिरा गांधी नहर का पानी अपराध छिपाने की आसान जगह बन चुकी है। यही वजह है कि हत्या जैसे संगीन अपराध में भी शवों को नहर में फैंक दिया जाता है। सड़ा-गला शव सैकड़ों किमी तक नहर में बह कर चला जाता है और जब मिलता है तो उसकी शिनाख्त तक नहीं हो पाती है। इंदिरा गांधी नगर में जनवरी 2010 से मई 2017 तक 1383 शव मिले, जिसमें 1192 शवों की पहचान नहीं हुई। सबसे ज्यादा श्रीगंगानगर में 721 शव मिले, जिसमें महज 67 की शिनाख्त हुई, 654 की नहीं हुई। हनुमानगढ़ में 427 शव मिले, जिसमें 71 की शिनाख्त हुई, 356 की नहीं हुई। बीकानेर में 155 शव मिले, सिर्फ 19 की शिनाख्त हुई, 136 की नहीं हुई। जैसलमेर में 80 शव मिले, जिसमें 34 की शिनाख्त हुई, लेकिन 46 की नहीं हुई।
शव मिलने के बाद पुलिस को यह करना होता है
शव मिलने के बाद फर्द कब्जा लेकर धारा 174 में रपट दर्ज कर अनुसंधान किया जाता है। प्रदेश सहित सभी थानों को सूचना भेजनी होती है। गुमशुदा लोगों की रिपोर्ट व हुलिया से शव का मिलान किया जाता है। पोस्टमार्टम करवा कर विसरा लेकर एफएसएल के लिए भेजा जाता है। पहचान नहीं होने पर 72 घंटे बाद अंतिम संस्कार पुलिस कर सकती है। डीएनए के सैंपल भी संबंधित पुलिस थाने में सुरक्षित रखने के निर्देश है। मृतक की सामग्री को सुरक्षित रखा जाता है।
यह हो रहा है इंदिरा गांधी नहर में
सरका दी जाती हैं लाशें: पुलिस की सांठ-गांठ से कई नहरी कर्मचारी शव डंडे से सरका देते हैं, जो 300 किमी तक बह जाते हैं।
बजट तय न जवाबदेही: शव निकालने, पैकिंग मोर्चरी तक पहुंचाने में 15 हजार रु. तक का खर्च आता है। इसकी व्यवस्था है नहीं।
हफ्ते बाद गलने लगता है: शव हफ्ते में सड़ने लगता है। पहचान मुश्किल होती है। ये ही वजह है कि 7 साल में बरामद 1383 शवों में 1192 की शिनाख्त तक नहीं हई।
पहचान के लिए विसरा, डीएनए सैंपल रखते हैं: एसपी
नहर में मिलने वाले अधिकतर शव सड़े-गले ज्यादा होते है, ऐसे में पहचान नहीं हो पाती है। शव मिलने के बाद सभी थानों को उसके मैसेज भेजते हैं। गुमशुदा लोगों के हुलिया और फोटो से लाश की मिलान भी करते है। विसरा, डीएनए सैंपल भी रखे जाते है ताकि मृतक की पहचान हो सके।
-प्रदीप मोहन शर्मा, एसपी, बीकानेर।
पिछले सात साल में इंदिरा गांधी नहर में मिले शव
वर्ष जैसलमेर बीकानेर गंगानगर हनुमानगढ़ कुल पहचान
हुई नहीं
2010 7 13 88 53 161 20 141
2011 14 23 112 61 210 25 185
2012 19 14 79 69 181 26 155
2013 12 19 92 61 184 27 157
2014 11 29 102 53 195 24 171
2015 12 25 95 58 190 32 158
2016 5 20 105 58 188 30 158
2017 0 12 48 14 74 7 67
कुल 80 155 721 427 1383 191 1192
नहर में मिली लाशें सड़ी-गली होने से नहीं हो पाती पहचान