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काव्य गोष्ठी में महिला सुरक्षा, परिवार-समाज और नशावृत्ति पर किए कवियों ने कटाक्ष
‘एक औरत मैं अपने भीतर बचाए रखता हूं’ और ‘वंश का कुल मान होती हैं बेटियां, घर की शान होती हैं बेटियां’ आदि कविताएं जब कवियों ने सुनाई तो महिला दिवस साकार हो गया। मौका था रविवार को मरुधरा साहित्य परिषद एवं कागद फाउंडेशन की ओर से महिला दिवस के उपलक्ष्य में काव्य गोष्ठी का। मुख्य अतिथि भागेश्वर प्रसाद त्यागी थे। अध्यक्षता राजकुमार त्यागी, एमए राठौड़ और मोहनलाल वर्मा ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की। कवि एमएम राठौड़ ने ‘नारी तुम केवल श्रद्धा की पात्र नहीं, विश्वास और भरोसे की प्रतीक हो’ और भटनेर दुर्ग गाथा से अवगत करवाते हुए राठौड़ ने पंक्तियां सुनाई। विनोद यादव ने ‘स्त्री सहेजती समय, वर्तमान और आगत-विगत के अनुभव से दो चार, पुरुष उन्माद में रत्त’ और ‘लड़कियां चुन के लाएंगी लकड़ियां, घर में चूल्हा सुलगाएगी लड़कियां घर और बाहर सब जरूरी है, दोनों जगह संतुलन बनाएंगी लड़कियां।’ कवि मोहनलाल वर्मा ने चालीस के बाद कविता सुनाते हुए जीवंतता से वातावरण में जोश भर दिया। ‘ए जीवन तूं कितना जटिल है। मैं तो सुलझाता हूं तूं उलझता जाता है।’ सुरेंद्र सत्यम ने ‘चरखे की बात पर, डंडे पर आ गए, सब लोग लौटकर उसी फंडे पर आ गए।’ बदमाश लोग गए हफ्ता वसूली पर, जो थे शरीफ वो चंदे पर आ गए।’ भ्रूण हत्या पर सुनाते हुए सुरेंद्र सत्यम ने ‘कचरे के ढेर पर फेंक दिया पिशाचाें की नगरी से अलविदा हो रही हूं।’ ‘मां मुझे क्यों कटवा रही है लोहे के औजारों से’, वीरेंद्र छपौला वीर ने ‘चल पड़ा मनुज तूं कंटकों की राह पर’ सुनाकर जिंदगी में बदलाव को शब्द बद्ध किया। नशा विषय पर भी वीरेंद्र छपोला ने पंक्तियां सुनाकर इसके प्रति जागरुक किया। ‘नशा किसी का मीत नहीं, इसकी किसी से प्रीत नहीं।’ वीरेंद्र छपौला ने बाबूड़ो भरतार सुनाई। डॉ. राजवीर सिंह ने ‘अंग्रेजियों के ढोंग पाल बैठे हैं, जीवन में कैसे-कैसे रोग पाल बैठे हैं’ सुना गोपालन पर जोर दिया। डॉ. प्रेम भटनेरी ने बेटियों को समर्पित पंक्तियां ‘वंश का कुल मान होती हैं बेटियां, घर की शान होती हैं बेटियां।’ ‘राख के ढेर में जिंदा कोई चिंगारी है, तुझको पाने का जतन अब भी जारी है।’ संचालन करते कवि नरेश मेहन ने महिला दिवस पर औरत कविता सुनाई। ‘सच मानिए एक औरत मेरे भीतर सदा से रहती है, एक औरत मैं अपने भीतर बचाए रखता हूं।’ ‘आओ भूखी चिड़िया को अपना खेत खिलाए।’ उन्होंने मां की महिमा बताते हुए कहा कि ‘कभी थी पर्वत, आज रेत के टीले सी ढह रही है मां।’