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आज महिला दिवस: उम्मीद, उत्साह, ऊर्जा काे बयां करती महिला शक्ति की कहानी

3 वर्ष पहले
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आज महिला दिवस है। भास्कर आज लाया है ऐसी मां की कहानी जिसने अपने सपनों का त्याग कर न केवल एबनोर्मल हो चुके बेटे को गंभीर स्थिति से निकाला बल्कि शादी के बाद सरकारी नौकरी में चयनित होकर बिखर चुके परिवार को भी संभाला। दरअसल, जंक्शन के सरकारी स्कूल में कॉमर्स व्याख्याता अंजु बाला का बेटा राहुल डेढ़ माह की उम्र में गोदी में खेलने के दौरान एक हादसे का शिकार हो गया, सिर में ऐसी गहरी चोट लगी कि वह एबनोर्मल हो गया। जयपुर सहित कई अस्पतालों में पांच साल तक ट्रीटमेंट चला। 10 से 15 लाख रुपए खर्च हो गए। पति की आर्थिक स्थिति डगमगा गई लेकिन इस महिला ने हिम्मत नहीं हारी। शादी के आठ साल बाद भी आरपीएससी फर्स्ट ग्रेड में पहली बार में चयनित होकर अपने परिवार के लिए सुरक्षा चक्र बनी। खास बात ये है कि इस महिला ने बिना किसी कोचिंग के अपने अनुभव के दम पर पहली ही बार में परीक्षा उत्तीर्ण की। बड़ी बात ये है कि अंजु बाला एक लेखक और सीए/सीएस बनना चाहती थी लेकिन परिवार की इस स्थिति में देखकर अपना रास्ता खुद बनाया। अब खुशी की बात ये है कि बेटा राहुल स्कूल जाता है और 7वीं कक्षा में पढ़ता है, मां अंजु बाला हर पल उसका सहयोग करती है।

परिवार को संभाला अब 7वीं में पढ़ता है बेटा
एक मां के संघर्ष की कहानी, जिसने बेटे और परिवार के लिए त्याग दिए खुद के सपने
हादसे में बेटे के सिर में बने क्लॉट, 5 साल तक इलाज पर 15 लाख खर्च हुए, अपने दम पर शिक्षक बनी मां...पूरे परिवार को संभाला
यूं करना पड़ा संघर्ष: हर 15 दिन बाद इलाज को जाना पड़ता था जयपुर, कई परेशानियां आई, पर हिम्मत नहीं हारी
एमकॉम तक शिक्षित चंडीगढ़ निवासी अंजुबाला बताती हैं कि 2002 में टाउन में उनकी शादी हुई। 2003 में बेटा हुआ। डेढ़ माह की उम्र में बेटा हादसे का ऐसा शिकार हुआ कि उसके दिमाग में क्लॉट हो गए। शरीर पैरालाइज्ड हो गया। वह एबनोर्मल हो गया। पांच साल तक जयपुर सहित कई अस्पतालों में इलाज करवाया। हर 15 दिन बाद जयपुर जाना पड़ता था। पति जिले सिंह का फर्नीचर का काम था। ऐसे में लाखों रुपए खर्च हो गए। कर्ज हो गया। मेरे सामने बड़ी विकट स्थिति पैदा हो गई लेकिन मैंने ठान लिया कि सरकारी नौकरी लगना है। हालांकि मेरा सपना था कि मैं लेखक, सीए या सीएस करूं। मैंने गेस्ट फेकल्टी में विद्यार्थी मित्र के रूप में काम किया। बड़ी बात ये है कि तब किस्मत ने साथ दिया 15 साल बाद 2010 में कॉमर्स के लिए वैकेंसी निकली। इसलिए यह मेरे लिए पहला और आखिरी चांस था। परिवार को इस स्थिति में देखकर मैंने यह धारणा बना ली कि नौकरी लगना ही है। न्यूज पेपर और गेस्ट फैकल्टी के अनुभव से मैंने परीक्षा की तैयारी की। कभी किताब तक नहीं खरीदी। मेरा सलेक्शन पहली बार में हो गया। कई बार तो ऐसी स्थिति आई जब बच्चा अस्पताल में था और उसी दिन मेरा पेपर था लेकिन मैंने दोनों कार्यों को शिद्दत से पूरा किया।

(आज महिला दिवस पर भास्कर में पैगाम देती विशेष कवरेज प्रत्येक पेज पर पढ़ें)

जज्बा ऐसा...पहली पोस्टिंग नोहर में मिली, बीमार बच्चे की सेवा से लेकर परिवार के सारे काम खुद ही करती
अंजु बाला ने बताया कि पहली पोस्टिंग नोहर के बालिका स्कूल में मिली। हनुमानगढ़ से नोहर रोजाना अप-डाउन करना बड़ा मुश्किल भरा था। उस समय इतने ज्यादा साधन भी नहीं थे। बच्चे को संभालना, उसे खाना देना, कपड़े पहनाना, पति का भी ख्याल रखना। ये सभी बड़ी मुश्किल से मैनेज किया। ऐसे में मेरी दृढ़ इच्छा ही थी कि 2015 में मुझे जंक्शन में पोस्टिंग मिली। अंजु बाला बताती हैं कि कोई कार्य अगर लगन और मेहनत से किया जाए तो वह अवश्य ही पूरा होता है।

प्रिंसीपल बोले...20 साल से नहीं पकड़ में आ रहा था कैश बुक का अंतर, इन्होंने एक झटके में निकाला : राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय जंक्शन के प्रिंसीपल कुलवंत सिंह ने बताया कि अंजु बाला ने बेहद संघर्ष किया है। घर-गृहस्थी में तो काबिले तारीफ है ही, वहीं इन्होंने स्कूल के लिए भी बेहद रोचक काम किया। दरअसल, पिछले सत्र में ऑडिट के दौरान कैश बुक में बड़ा अंतर आ रहा था। इन्होंने इस अंतर को ढूंढा, जो 20 साल से पकड़ में नहीं आ रहा था। यह बड़ी बात थी, जो इन्होंने एक झटके में हल की।

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