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दिन देखकर चेहरा बदलते हैं ये आर्टिस्ट, फिल्में भी बन चुकी हैं इन पर

दिन देखकर चेहरा बदलते हैं ; ये वो हैं... जो रोज दूसरों को खुशी देने के लिए निकलते हैं

Danik Bhaskar | Jan 15, 2018, 02:37 AM IST

जयपुर. ये वो हैं जो रोज चेहरा बदलते हैं। कुछ लोग इन पर हंसते हैं...कुछ मजाक बनाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो श्रद्धा से सिर्फ सिर झुका देते हैं। सोमवार को भगवान शिव, मंगल को हनुमान बनकर निकलने वाले ये हैं बांदीकुई में रहने वाले सुबराती खान। रोज तीन से चार घंटे मेकअप के बाद इनका रूप निकलकर सामने आता है।

- सुबराती बताते हैं कि पीढ़ी दर पीढ़ी इसी बहरूपिया कला के बूते पर उनका परिवार चल रहा है। जब मैं रोज घर से निकलता हूं...तो कई घंटे पहले ही घर की महिलाएं, बच्चे और युवा मुझे तैयार करने में जुट जाते हैं। कोई कपड़े ठीक करता है तो कोई मेकअप। पड़ोसी तो मुझे कैरेक्टर के नामों से ही पुकारने लगे हैं। यानी रोज चेहरा तो नया होता ही है...नाम भी नया होता है।

- सुबराती के मुताबिक देश में करीब दो लाख से ज्यादा बहरूपिया कलाकार हैं, इनमें से अधिकतर राजस्थान में हैं। हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही धर्मों से जुड़े लोग इस कला में हैं। उम्र के लिहाज से सुबराती अब रोज रूप बदलकर बाजार में नहीं जाते। उनके छह बेटे हैं। सभी इस कला से जुड़े हैं।

- उनके बेटे अकरम और फरीद बताते हैं- हमारे बुजुर्गों ने इस कला को बहुत आगे बढ़ाया, लेकिन बदलते वक्त में यह बहुत बुरे दौर में है। बड़े-बुजुर्ग बताते थे कि राजा-महाराजाओं के वक्त तो हमें सम्मान मिलता था, लेकिन आज हालात कुछ और हैं। अब रोजी-रोटी का भी कोई ठिकाना नहीं है। हम छह लोग मिलकर काम करते हैं, तब जाकर घर चल पाता है।


सुबराती अपने पोतों को यह कला नहीं सिखाना चाहते। कहते हैं अब कोई कद्र रही नहीं है। लोग भगवान के रूप में इज्जत करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो मजाक उड़ाते हैं, और पैसा तो कोई देता ही नहीं है। सुबराती फ्रांस, बेल्जियम, हांगकांग की यात्रा कर चुके हैं, लेकिन उन्हें मजदूरी से ज्यादा कमाई नहीं हुई। कहते हैं कि सिर्फ हमें लाने-ले जाने का खर्च ही आयोजकों ने उठाया। जितना पैसा हमें दिया गया, उससे कई गुना तो बिचौलियों ने कमाया है।

इन पर फिल्में बन चुकी हैं, पर पहचान नहीं
सुबराती बताते हैं कि हम कलाकारों पर कई बार डॉक्यूमेंट्री बन चुकी हैं। फिल्म वाले आते हैं...अपनी मर्जी से काम कराते हैं, लेकिन पैसा नहीं देते। पैसा उतना ही देते हैं...जितना हम रोज लोगों के बीच जाकर कमा पाते हैं। सुबराती कहते हैं कि अब उनका जीवन पहले के मुकाबले ज्यादा मुश्किल हो गया है। चूंकि महंगाई बढ़ गई है...ऐसे में मेकअप के लिए मिलने वाली प्राकृतिक चीजों के दाम भी बढ़ चुके हैं।

सरकार से भी नहीं मिल रही कोई मदद
बहरूपिया कला को प्रोत्साहन न मिलने से सुबराती नाराज हैं। कहतें हैं कि सरकार को तो हमसे कोई लेना-देना ही नहीं है। अगर सरकारी मदद मिले तो हम इस कला को जिंदा रख पाएंगे। आखिर लोग खुश होते हैं तो हमें भी खुशी मिलती है। और फिर किसी को हंसाना तो यूं भी बहुत बड़ा काम माना गया है।