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भास्कर बायइन्विटेशन: जवाहरलाल नेहरू के 17 वर्ष के शासन में जो मुद्दे विद्यमान थे, वो आज भी ज्वलंत हैं

राजनीतिक, सामाजिक स्तर पर जो मुद्दे कभी हल ही नहीं हुए उन पर प्रकाश डाल रहे हैं प्रो. केएल शर्मा

प्रो. केएल शर्मा | Last Modified - Dec 29, 2017, 06:58 AM IST

भास्कर बायइन्विटेशन:  जवाहरलाल नेहरू के 17 वर्ष के शासन में जो मुद्दे विद्यमान थे, वो आज भी ज्वलंत हैं

आजादी के बाद हर साल निरन्तरता और परिवर्तन की झलक दिखती है। कुछ मुद्दे जो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 17वर्ष के शासन में विद्यमान थे, वो आज भी ज्वलंतहैं। भ्रष्टाचार पहले भी था, भ्रष्टाचार आज भी है। राजनेता और नौकरशाह दोनों भ्रष्ट गतिविधियों के अगवा रहे हैं। इंस्पेक्टरराज में नौकरशाह भ्रष्ट आचरण में लिप्त थे। अभी भी निजीकरण और उदारीकरण के परिणामस्वरूप धनाढ्य वर्ग, नेताओं के पिछलग्गू, बड़े व्यवसायी और दलालों का वर्चस्व है। अमीर-गरीब की खाई गहरी ही हुई है। 70 वर्ष में ढांचागत परिवर्तन की गति स्तरीय नहीं हुई है, फिर भी शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, संचार क्षेत्रों में परिवर्तन हुये हैं। प्रश्न यह कि क्या इन परिवर्तनों से वंचित, गरीब, ग्रामीण, श्रमिक व किसान को वितरणीय न्याय मिला है?

दूसरा प्रश्न यह है कि क्या संख्यात्मक परिवर्तन के अनुरूप गुणात्मकता पर बल दिया गया है? शासन को इन प्रश्नों के उत्तर देने होंगे। यहां हम केवल 2017 पर ध्यान केन्द्रित करना चाहते हैं। इस वर्ष में राजनीतिक प्रक्रिया द्वारा सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याएं उभरी और उनके समाधान देने में शासन का रुख टालने वाला ही रहा। आरोप-प्रत्यारोप का वाक-युद्ध जारी रहा। दोषारोपण की प्रवृत्ति चरम पर रही। संगठनों, संस्थाओं और कार्यक्रमों को लेकर शिथिलता रही, और व्यक्ति, परिवार, वंश, पूर्वज को केन्द्र में रखकर राजनीति हावी रही।

वैमनस्यता और कीचड़ उछालना प्रमुख बिन्दु रहे। सत्ता के लिए राजनीतिक प्रतियोगिता प्रजातन्त्र के आधार के रूप में लुप्त थी, यद्यपि वैमनस्यता बिना रोकटोक के कायम रही। गैर-संसदीय शब्दों और विकृत भाषा का प्रयोग चरम सीमा पर रहा। सत्ता पर स्थापित होने की चाहत सर्वोपरी रही, चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े। यही सन्देश हर राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधि से उभर कर आया। चुनावों में विजय-पराजय को एक खिलाड़ी की भावना से न लेकर, विजयी ने पराजित को दबाने के भाव से कार्य किया।

माइकल फुको ने लिखा है विजयी समूह पराजित लोगों को समाज से दूर एकान्त में रखते थे, ताकि वे विजयी को पुनः चुनौती नही दे सके।

वर्तमान में, छापेमारी, आरोप-पत्र, जेल की सजा, सम्पति का अधिग्रहण आदि की प्रवृति काफी सीमा तक राजनीतिक वैरभाव को प्रदर्शित करती है। 2016 में लिये गये विमुद्रीकरण का निर्णय 2017 में भी छाया रहा। शासन पूरे वर्ष में इसके लाभों को गिनाता रहा। कालेधन व आतंकवाद पर इस कदम द्वारा नियंत्रण करने का दावा किया गया। परन्तु आतंकवाद कम नहीं हुवा। हमारी अन्तरराष्ट्रीय सीमा निरन्तर बेहद अशांत रही। दैनिक श्रमिक की आर्थिक अवस्था पर नोटबन्दी के दुष्प्रभाव पर शासन चुप्प रहा। 200 से अधिक लोग मरे। परिवारों पर कर्ज भार अचानक बढ़ा। विवाहों के आयोजन मे बाधा आई। बैंक कर्मियों ने भ्रष्ट तरीकों से हेराफेरी की। कालेधन को सफेद करने के तरीके ढूंढ़ निकाले गए।

इसके पश्चात्, 2017 में, वर्षों से लम्बित जीएसटी लागू की गई, जिसके कारण नोटबन्दी की तरह, गरीब, श्रमिक, छोटे उद्यमी आदि पर बेरोजगारी के रूप में दुष्प्रभाव सामने आया। ये धरातलीय प्रश्न है। इन पर सुधारात्मक विमर्श को दरकिनार किया गया। जीएसटी का प्रावधान अनेक बार संशोधित किया गया है। उदारीकृत भारत ने निजीकरण को प्रोत्साहित तो दिया, परन्तु स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में गुणवता को सुनिश्चित करने में ढिलाई दिखाई। शिक्षण संस्थाओं में शासक दल के अनुचित प्रभाव के मामले आए हैं। एक शासन पिछले शासन की कमियों को गिना कर अपनी कमियों को छुपा नही सकता। यह छुपाने की प्रवृत्ति 2017 में चरम सीमा पर रही।

शासन को मैंडेट के अनुसार कार्य करते हुए अपनी साख स्थापित कर उत्तरदायी बनना होगा। क्या वर्तमान शासन अपने घोषित कार्यक्रम के अनुसार कार्य संचालन कर रहा है? यह प्रश्न हर नागरिक के लिये विचारणीय है। 2017 में, औपचारिक व प्रतीकात्मक परिवर्तनों की झड़ी लगी रही। 2017 से पहले, योजना आयोग का नाम बदल कर नीति आयोग किया गया था। पंचवर्षीय योजना के स्थान पर तात्कालिक आवश्यकता अनुसार आय-व्यय की व्यवस्था का प्रावधान आयोजित किया गया था। 2017 में इन परिवर्तनों का सकारात्मक परिणाम नगण्य रहा। उच्च शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश की पद्धति को परिवर्तित किया।


अब एमसीआई बदल कर एक नए बोर्ड़ के गठन की योजना बनाई जा रही है। यूजीसी को भी शायद परिवर्तित किया जायेगा। चॅंूकि भूतकाल के ये नामाकरण है, इसलिये इनको बदलना वर्तमान शासन की राजनैतिक चाहत है। क्या यह सोच देश हित मे है? शासन का रूख कुछ संस्थाओं के प्रति रूखा रहा। उनकी शासन व्यवस्थाओं, शिक्षा की गुणवता और संवाद की प्रवृति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

(लेखक जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रो. चांसलर हैं)

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Web Title: bhaaskar baayinviteshn: jvaaharlaal neharu ke 17 vrs ke shaasn mein jo mudde vidymaan the, vo aaj bhi jvlnt hain
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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