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भास्कर ग्राउंड रिपोर्ट: कैंडिडेट कोई भी हो, जीतेंगी जातियां ही

उपचुनाव विशेष. पढ़िए 2 लोकसभा, 1 विधानसभा सीट पर सियासी संघर्ष की जमीनी हकीकत

Bhaskar News | Last Modified - Jan 19, 2018, 03:47 AM IST

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    जयपुर. अजमेर, अलवर लोकसभा और मांडलगढ़ विधानसभा उपचुनाव को भाजपा-कांग्रेस के बीच सेमीफाइनल मुकाबला माना जा रहा है। उपचुनाव में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट की प्रतिष्ठा दांव पर है। भाजपा के लिए वर्चस्व बनाए रखने की भी चुनौती होगी क्योंकि तीनों ही सीट भाजपा के पास पहले से है। राजनीतिक विश्लेषक यह मानकर चल रहे हैं कि यहां होने वाली हार-जीत कई नए समीकरण बनाएगी।


    आखिर इन उपचुनावों के मायने क्या हैं? और चुनाव के मैदान में प्रत्याशियों के वोट मांगने का आधार क्या है? जब भास्कर संवाददाताओं ने ग्राउंड पर जाकर इसकी पड़ताल की तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।

    हैरानी यह है कि तीनों ही जगह से एक फरवरी को आने वाले चुनाव परिणाम उम्मीदवारों के चेहरे नहीं बल्कि जातियाें का वोट बैंक तय करेगा। आप कह सकते हैं अलवर, अजमेर और मांडलगढ़ में उम्मीदवार नहीं जातियां जीतेंगी। यही वजह है कि दोनों ही दलों ने जातियों के आधार पर ही टिकट बांटे हैं।


    किसानों की कर्ज माफी, बिजली और बेरोजगारी हर बार की तरह इस बार भी चुनावी मुद्दे हैं, लेकिन उनकी कहीं पूछ नहीं हो रही। अलवर में तो जातिवाद सबसे हावी दिखा। यहां प्रत्याशी ही नहीं, पर्यवेक्षक और प्रचारक भी जाति देखकर तय किए गए हैं।

    कुछ ऐसी ही स्थिति अजमेर में भी है। यहां भाजपा ने सुरक्षित रणनीति अपनाते हुए दिवंगत नेता सांवरलाल जाट के बेटे रामस्वरूप लांबा को टिकट दिया है। चूंकि जाट यहां वोट बैंक के नजरिए से देखें तो एससी के बाद दूसरी सबसे बड़ी ताकत है। मांडलगढ़ विधानसभा में पहली बार जातिवाद देखने को मिल रहा है।

    जानकार बताते हैं-यहां अब तक नेताओं का कद ही जीत का आधार था। इस बार ऐसा नहीं है। बहरहाल, 29 जनवरी को तीनों ही जगह वोटिंग है और एक फरवरी को जातियों पर टिके जीत के चेहरे सामने आ जाएंगे। पढ़ें, अलवर की पूरी रिपोर्ट....

    पिछले 16 में से 8 चुनावों में यादव जीते, 8 विधानसभा क्षेत्रों से 3 यादव विधायक
    - यहां सबसे ज्यादा यादव वोट हैं। यही वजह है पिछले 16 में से आठ चुनावों में यादव को जीत मिली है। यह ऐसी सीट है, जहां प्रत्याशी ही नहीं पर्यवेक्षक, प्रचारक भी जाति देखकर तय होते हैं।
    - यहां 16 में से 10 चुनावों में कांग्रेस को जीत मिली है। दो बार पूर्व राजपरिवार से जुड़े उम्मीदवार जातीय समीकरणों को पलट कर जीते हैं।

    बड़े मुद्दे ये
    कथित गौरक्षा के नाम पर हुई हत्याएं बड़ा मुद्दा हैं। राजगढ़-लक्ष्मणगढ़, खैरथल, रामगढ़, तिजारा और अलवर ग्रामीण में पानी की विकट समस्या।

    जाति नहीं, विकास को जीत का आधार बनाएंगे। पहले भी हम इसी वजह से 163 सीटें जीते थे। अब भी तीनों जगह विकास के दम पर ही चुनाव जीतेंगे।

    -अशोक परनामी, प्रदेशाध्यक्ष

    हमने पार्टी के निष्ठावान लोगों को चुनाव में उतारा है। भाजपा को लायक उम्मीदवार नहीं मिले, इसलिए अलवर में सीटिंग एमएलए को टिकट दिया जो सरकार में मंत्री है।

    -सचिन पायलट, प्रदेशाध्यक्ष

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    वोट का आधार कम फिर भी 7 बार वैश्य, कायस्थ और सिंधी सांसद बने
    यहां रावत जाति के करीब 80 हजार वोट बताए जा रहे हैं। अन्य जातियों के मुकाबले इनका आधार कम है। फिर भी 16 चुनावों में 5 बार (1989 से 2009) भाजपा के रासासिंह रावत सांसद रहे।
    - कम आधार होने पर भी सात बार वैश्य, कायस्थ, सिंधी और ब्राह्मण सांसद रहे। अब तक 8 बार कांग्रेस, 6 बार भाजपा और 1 बार बीएलडी जीती है।

    बड़े मुद्दे ये
    बिजली कटौती, किसान का कर्ज और बीसलपुर विस्थापितों के लिए चारागाह देने जैसे जातीय और पंचायत स्तर के 80 से ज्यादा मुद्दे।

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    यह वही सीट जहां बिना जातीय आधार के 6 बार चुने गए थे शिवचरण माथुर
    पिछले विधानसभा चुनाव तक जातिवाद कभी नहीं जीत पाया। स्थानीय नेताओं के कद के आगे जातिवाद दबा रहा। पहली बार टिकट का बंटवारा जातिगत आधार पर हुआ है।

    - यह वही सीट है जहां से शिवचरण माथुर छह बार विधायक रहे। जबकि यहां उनका आधार नहीं था। यहां उनकी ससुराल थी।

    बड़े मुद्दे ये
    बजरी खनन, किसान कर्ज माफी, बेरोजगारी सबसे बड़े मुद्दे हैं। यहां करीब 99 फीसदी किसान कर्ज में डूबा है। 4 बड़े उद्योग लगाने की घोषणा पूरी न होने से लोगों में नाराजगी।

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Web Title: Bhaskar Special Report On Alwar, Ajmer And Mandlgarh Bypolls
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