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चंबल के बहाव में कमी से घड़ियालों के गहरे कुंड सूखे, जनवरी में जून जैसे हालात

सात साल में चंबल का बहाव 106 क्यूसेक मीटर प्रति सैकंड से 67 पर आया, जनवरी में जून जैसे हालात।

Danik Bhaskar | Jan 22, 2018, 12:52 AM IST

धौलपुर. सदानीरा बहने वाली चंबल नदी में पारिस्थितिक तंत्र में लंबे समय करीब 100 साल बाद बहुत बड़ा परिवर्तन देखने में आया है। चंबल का जलस्तर घटने का संकट वैसे तो जो जून जुलाई की भीषण गर्मी में ही देखा जाता है, लेकिन अभी दिसंबर-जनवरी में जून जुलाई जैसी स्थिति नजर आने से गहरे पूल सूख गए हैं। दिसंबर 2011 में चंबल में पानी का बहाव 106 क्यूसेक मीटर प्रति सैकंड रिकॉर्ड किया था जो दिसंबर 2017 में मात्र 67 क्यूसेक मीटर प्रति सेकंड रहा।

- चंबल के बहाव में कमी से डॉल्फिन और घड़ियालों के रहवास वाले गहरे कुंड सूख गए हैं। ऐसे में उनके हैबिटॉट पर विपरीत असर पड़ रहा है।
- इस साल चंबल में नवंबर से ही पानी कई जगहों पर 2 से 5 फीट तक रह गया है। जबकि डॉल्फिन व व्यस्क घडिय़ालों का गहरे पानी में ही रहवास होता है।
- घड़ियाल और डॉल्फिन पर आए इस संकट को गंभीरता से लेते हुए वन विभाग मुरैना और वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की ओर से चंबल में सर्वे चल रहा है।
- नदी के अन्य क्षेत्रों में भी पानी की मात्रा का सर्वे किया जा रहा है। ताकि गर्मी आने से पहले जलीय जीवों के संरक्षण के उचित कदम उठाए जा सकें।
- सर्वे में बुजुर्गों ने कहा है कि हमने आज तक चंबल में पानी का स्तर इतना कम नहीं देखा। यह बहुत बड़ी बात है। जलीय जीवों के रहवास में संकट की स्थिति दिख रही है।

घड़ियालों पर ऐसे आएगा संकट
- रेत कम होने से घड़ियाल अंडे नहीं दे पाएंगे।
- जहां रेत और पानी शेष बचेगा वहां घड़ियालों की भीड़ हो जाएगी, जिससे भोजन का संकट खड़ा होगा।
- अंडे खराब होने से हैचिंग प्रभावित होगी, घड़ियाल क्राइसिस की संभावना भी बढ़ जाएगी।
- फरवरी तक नदी लगभग सूख जाएगी, जिससे डॉल्फिन पर संकट आएगा।

आवश्यकता:
- मौजूदा मौसम को देखते हुए इस समय 100 से 106 क्यूसेक मीटर प्रति सैकंड पानी के बहाव की आवश्यकता
- 2011 दिसंबर में 106 क्यूसेक मीटर प्रति सैकंड रिकॉर्ड किया था।


पहली बार इतना कम दिखा पानी
- गढ़ी जाफर के नत्थी सिंह ने बताया कि हर वर्ष बारिश के मौसम में चंबल में बाढ़ आती थी। पहली बार बारिश का मौसम जाने के बाद भी चंबल का पानी इतना कम पहली बार देखा है।
- हरनारायणन बघेल ने बताया कि नदी किनारे गांव होने से हमेशा ही चंबल को पानी से लबालब देखा है। पहली बार में चंबल में इतना कम पानी देख रहा हूं। नदी में गहराई वाले स्थानों पर टापू निकल आए हैं।

एक्सपर्ट व्यू : हालात विकट, कोटा बैराज से पानी छोड़ने की दरकार
- डीएफओ मुरैना एए अंसारी ने बताया कि देहरादून से आई विशेषज्ञों की टीम ने चंबल नदी का सर्वे किया था, जिसमें पानी का जलस्तर पहली बार कम देखा गया है। इस बार सर्वे हुआ है। जून में दुबारा सर्वे और किया जाएगा। फिर अगले साल इसका क्या फर्क पड़ता है, वह देखा जाएगा।
- चंबल में पानी का बहाव कम हो से डॉल्फिन व घड़ियालों के गहराई वाले पूल लगातार घट रहे हैं। नदी के बहाव में कमी आने के बाद इसमें पल रहे विलुप्त प्रायः प्रजाति के जलीय जीवों का जीवन संकट में दिखाई देने लगा है। अगर पानी का बहाव चंबल में बढ़ता है तो गहराई वाले घट रहे पूल प्राकृतिक गहराई प्राप्त कर लेते हैं।

किनारों की सारी रेत नदी के बीच में आ गई, अंडे देने में होगी परेशानी
- इस बार बाढ़ न आने से किनारों की सारी रेत नदी के बीच में आ गई है। घडिय़ालों को अंडे देने के लिए 1 से डेढ़ मीटर मोटी रेत की परत चाहिए होती है, लेकिन इस बार किनारों पर दो से ढाई फीट ही रेत है।
- 80 से 100 साल के बुजुर्गों की मानें तो उनके जीवनकाल में पहली बार ऐसा हुआ है जब पानी सूखने की शुरुआत नवंबर में हो गई।

- किनारों की सारी रेत धीमे बहाव के कारण नदी के बीच के गड्ढों में जमा हो गई है। इससे घडिय़ालों को अंडे देने में भी परेशानी आएगी।

चिंता: अगले महीने गणना में भी आएगी कठिनाई, मोटर बोट लायक पानी ही नहीं
- फरवरी में नदी में जलीय जीवों की गणना बोट से होनी है। वर्तमान में नदी में कई जगह बोट चलने लायक पानी नहीं है। ऐसे में पैदल चलकर गणना करनी पड़ेगी। बता दें कि चंबल में पानी के गहरे कुंड सूखने से जलीय जीव जगह भी बदलने को मजबूर होंगे।

पांच माह तक चलेगा सर्वे
- जलीय जीव विशेषज्ञ और घडिय़ाल केयर टेकर, मुरैना ज्योति डंडोतिया ने बताया कि डॉल्फिन व घड़ियालों के डीप पूल सूख गए हैं।
- वन विभाग व डब्लूआईआई की ओर से सर्व कर जगह जगह पानी का फ्लो चैक किया है। यह सर्वे चार-पांच महीने होगा, इसमें हर महीने की पानी की स्पीड देखी जाएगी।
- सर्वे में चंबल के बहाव और घड़ियालों वाले घाटों पर पानी गहराई का अध्ययन होगा। पानी की आवश्यकता पर कोटा बैराज में मीटिंग कर पानी की मांग की जाएगी। वैसे इस चिंता के विषय पर साइंटिस्ट भी शोध कर रहे हैं, कैसे इसका हल ढूंढा जाए।