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गहलोत और वसुुंधरा राजे दो ही ऐसे लीडर, जो पार्टी अध्यक्ष से सीधे मुख्यमंत्री बने

श्याम आचार्य | Last Modified - Jan 14, 2018, 08:55 AM IST

भास्कर ने पार्टी प्रदेश अघ्यक्ष और मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड खंगाला तो सामने आई यह हकीकत ।
गहलोत और वसुुंधरा राजे दो ही ऐसे लीडर, जो पार्टी अध्यक्ष से सीधे मुख्यमंत्री बने

जयपुर.पहली विधानसभा के गठन के बाद से राजस्थान की राजनीति में दो ही ऐसे राजनेता रहे हैं, जो अपनी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद से सीधे मुख्यमंत्री बने। ये हैं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे। कांग्रेस के कुछ राजनेता अपनी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भले ही रहे हो लेकिन वे प्रदेश अध्यक्ष से सीधे मुख्यमंत्री नहीं बने। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास, मोहनलाल सुखाड़िया, हरिदेव जोशी, भैरों सिंह शेखावत आदि प्रमुख हैं। इनके अलावा दो राजनेता ऐसे भी रहे, जो कभी अपनी पार्टी के कभी प्रदेश अध्यक्ष नहीं रहे, लेकिन मुख्यमंत्री बने।

सीकर में पूर्व सीएम गहलोत के बयान के बाद भास्कर ने रिकॉर्ड खंगाला

- सीकर में पत्रकारों के सवाल के जवाब में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जब यह कहा – "कुछ लोग पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को सीएम के सपने दिखा देते हैं लेकिन उन्होंने कभी इसके लिए लॉबिंग नहीं करवाई।:"

- गहलोत के बयान के बाद कांग्रेस की अन्दरुनी राजनीति भले ही गरमाई नहीं हो लेकिन प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री की कुर्सी के बीच के रिश्ते को लेकर चर्चाओं का दौर तेजी से चल पड़ा है। अगर राजनीति के रिकॉर्ड पर नजर डालें तो पता चलता है, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत 1998 के विधानसभा चुनाव के समय प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे। उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया। तब कांग्रेस के भीतर यही चर्चा थी कि इस बार मुख्यमंत्री जाट अथवा ब्राह्रण जाति का बनेगा।

- कुछ क्षेत्रों में राजपूत जाति के विधायक के भी मुख्यमंत्री बनने की संभावना व्यक्त की गई। इस चर्चा को हवा तब मिली जब जयपुर ग्रामीण से नवल किशोर शर्मा, भोपालगढ़ से परसराम मदेरणा, मंडावा से रामनारायण चौधरी और बल्लभनगर से गुलाब सिंह शक्तावत को टिकट दिए गए। उस समय प्रदेश अध्यक्ष अशोक गहलोत ही कांग्रेस के स्टार प्रचारक थे।

- चुनाव से पूर्व उन्होंने ही पूर्व मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत की सरकार के कार्यकाल में जेल भरो जन आंदोलन किया। जब शेखावत के खिलाफ कोई वरिष्ठ कांग्रेसी नेता बोलने से कतराता था, तब गहलोत ने ही उनका नीतिगत विरोध किया। लेकिन स्वयं पर्दे के पीछे रहे।

तब मदेरणा ने गहलोत के लिए की थी मनाही

- जब आम चुनाव संपन्न हो गए तो मुख्यमंत्री पद के लिए लॉबिंग चलने लगी। तब तक अशोक गहलोत का नाम उभर कर आ गया था। जब जयपुर की खासकोठी में पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. माधव राव सिंधिंया के पर्यवेक्षक के रूप में नेता चयन के लिए विधायकों की बैठक हुई तो सिंधिया ने परसराम मदेरणा को गहलोत का नाम विधायक दल के नेता पद के लिए प्रस्तावित करने का सुझाव दिया। लेकिन मदेरणा ने मनाही के लिए गर्दन हिला दी। बाद में अशोक गहलोत ही विधायक दल के नेता चुने गए और उन्होंने 1 दिसंबर 1998 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। जब गहलोत दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो उस समय प्रदेश में डॉ. सी.पी. जोशी पार्टी अध्यक्ष थे और मुख्यमंत्री पद के मजबूत दावेदार थे। जोशी मात्र एक वोट से चुनाव हार गए थे।

वसुंधरा ने परिवर्तन यात्रा से बनाया माहौल

- बारहवीं विधानसभा में वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्रीत्व में भाजपा की सरकार बनी। वसुंधरा राजे केन्द्रीय राज्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद भाजपा की प्रदेश अध्यक्ष बनी। लेकिन उन्होंने करीब दो माह तक यह पद नहीं संभाला। जब वे दिल्ली से जयपुर आई तो वर्तमान प्रदेश भाजपा कार्यालय (पटेल मार्ग) पर उन्होंने अपने कक्ष की वैदिक तरीके से पंडितों से पूजा करवाई और 4 दिसंबर 2002 में पद ग्रहण किया।

- पहले पूर्व केबीनेट मंत्री भंवर लाल शर्मा भी प्रदेश अध्यक्ष भाजपा अध्यक्ष थे। वसुंधरा राजे ने परिवर्तन यात्रा भी निकाली और प्रदेश प्रदेश में भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया। 8 दिसंबर 2003 में उन्होंने मुंख्यमंत्री पद की शपथ ली। वे प्रदेश अध्यक्ष पद से सीधे मुख्यमंत्री बनने वाली दूसरी राजनेता हैं। वसुंधरा राजे जब दूसरी बार मुख्यमंत्री बनीं तो प्रदेश अध्यक्ष अरूण चतुर्वेदी थे।

छह मुख्यमंत्री ऐसे जो कभी पार्टी अध्यक्ष भी रहे
1. जय नारायण व्यास
2. मोहन लाल सुखािड़या
3. हरिदेव जाेशी
4. बरकतुल्ला खान
5. भैरों सिंह शेखावत
6. हीरा लाल देवपुरा

दो मुख्यमंत्री जो कभी पार्टी अध्यक्ष नहीं रहे
1. जगन्नाथ पहाडि़या
2. शिवचरण माथुर

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Web Title: gahlot aur vsuundhraa raaje do hi aise lidar, jo party adhyks se sidhe mukhyMantri bane
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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