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जो दो जून की रोटी को मोहताज, उनमें हॉकी की अलख जगा रहा इस खेल का दीवाना

हरजिंदर सिंह बरार दे रहे गरीब बच्चों को हॉकी की ट्रेनिंग, कई खेल चुके हैं नेशनल

Danik Bhaskar | Jan 22, 2018, 05:25 AM IST

जयपुर. राजस्थान यूनिवर्सिटी के डॉ. परमजीत सिंह हॉकी मैदान में करीब 40 से 50 बच्चे रोजाना सुबह-शाम हॉकी की तालीम लेने आते हैं। इनमें ज्यादातर ऐसे हैं जिनके माता-पिता उन्हें अच्छे से पाल-पोस कर बड़ा करने में भी सक्षम नहीं हैं। कभी-कभी तो इन बच्चों को दो जून की रोटी तक नसीब नहीं होती। किसी के पिता गलियों में ठेला चलाकर सब्जी और फ्रूट बेचते हैं, किसी की मां घरों में काम करती है तो किसी के पिता चौकीदार हैं तो किसी के मिस्त्री। कुछ राजस्थान यूनिवर्सिटी में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के बच्चे हैं और यहीं फोर्थ क्लास क्वार्टर में रहते हैं।


- इन बच्चों में राष्ट्रीय खेल हॉकी की अलख जगाई है इस खेल को जूनुन की हद तक प्यार करने वाले हरजिंदर सिंह बरार ने।

- हरजिंदर सिंह ने 14 साल (1976 से 1990)राजस्थान के लिए हॉकी खेला। वे पिछले साल ही एजी ऑफिस से सीनियर एकाउंटेंट के पद से रिटायर हुए हैं। कहते हैं, मुझे हॉकी ने सबकुछ दिया। नेशनल खेला। राजस्थान की जूनियर और सीनियर दोनों टीमों का कप्तान रहा। इस खेल ने मुझे नौकरी दी और मेरे बच्चे पले-बढ़े।

- एक बार ऑफिस में बैठे-बैठे ख़याल आया कि इस खेल ने मुझे इतना कुछ दिया है तो मुझे में कुछ लौटाना चाहिए। बस तभी से इन गरीब बच्चों को ट्रेनिंग देने का सफर शुरू हुआ। पहले आयू के फोर्थ क्लास के क्वार्टर्स के कुछ बच्चों के साथ यह सफर शुरू हुआ। अब यहां 40 से 50 बच्चे आते हैं।

कुछ बच्चों की कहानी उनकी ही जुबानी

बीना पांडे : तीन साल पहले पापा का साइलेंट अटैक से निधन हो गया। आरयू मेस में कुक थे। अब मम्मी फोर्थ क्लास में जॉब करती हैं और हम चारों बहनों का खर्चा चलाती हैं। एक ही ख्वाहिश है कि देश के लिए हॉकी खेलूं। अच्छी जॉब मिले तो मम्मी का हाथ बंटाऊं। सीनियर नेशनल बी डिवीजन में रजत पदक जीता है।


पूनम कटेरिया : कोच सर का सपोर्ट नहीं होता था मैं आज हॉकी नहीं खेल पाती। पापा फल-सब्जी का ठेला लगाते हैं। घर में 4 बहन और 1 भाई है। किराए का मकान है। पापा तो बस से आने के पैसे भी नहीं देते। मम्मी चोरी-छिपे पैसे देती हैं तो एकेडमी तक पहुंचती हूं। हॉकी स्टिक भी सर ने दिलाई थी। टी-शर्ट वगैरह का इंतजाम भी सर करते हैं। सीनियर स्टेट और यूनिवर्सिटी नेशनल खेल चुकी हूं। बस अब हॉकी ही मेरी लाइफ है और इसी में आगे बढ़ना है।


बजरंग सैन : मेरे पिताजी मालवीय गर्ल्स हॉस्टल में गार्ड हैं। पहले क्रिकेट खेलता था। पापा ने कहा, हॉकी खेलो। कोच सर ने काफी सपोर्ट किया। हॉकी दी, जूते दिए, किट दी। स्कूल स्टेट खेल चुका हूं। सबजूनियर में ब्रॉन्ज मेडल जीता। एक बार अशोक ध्यानचंद जयपुर आए थे तो मेरा खेल देखकर मुझे 1 साल के लिए एमपी एकेडमी ले गए।

ललिता महावर : मेरे पापा मिस्त्री थे। हार्टअटैक के बाद से बिस्तर पर हैं। तीन बहन और एक भाई है। दीदी मैकडॉनल्ड में सर्विस करती हैं। उन्हीं की सैलरी से घर चलता है। ब्रह्मपुरी से आती हूं। कभी-कभी बस का किराया भी नहीं मिलता तो एकेडमी नहीं पहुंच पाती। कोच सर के सपोर्ट से ही खेल पा रही हूं। सीनियर स्टेट और वेस्ट जोन यूनिवर्सिटी खेल चुकी हूं।


कुलजीत सिंह : पापा वेल्डिंग का काम करते हैं। चार साल से हॉकी खेल रहा हूं। चाचा खेलते थे वे ही मुझे कोच सर के पास लाए। उसके बाद से मैंने अपना पूरा ध्यान हॉकी पर लगा दिया। जिला, स्टेट, नेशनल खेला। नेशनल में कांस्य विजेता टीम का सदस्य रहा। सर ने हॉकी स्टिक दी, शिन गार्ड दिए, बॉलें दीं। कोच सर के सपोर्ट के बिना यह संभव नहीं होता।


विकास सैन : मेरे पापा आरयू में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। पापा ने ही मुझे हॉकी खेलने को कहा। मैं अंडर-14, केडी सिंह बाबू टूर्नामेंट में खेल चुका हूं। अभी 11 साल का हूं और अंडर-14 खेल चुका हूं। तीन साल से खेल रहा हूं। कोच बहुत सपोर्ट करते हैं। इसलिए यह खेल अच्छा लगता है।