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10 साल के बेटे ने मांगा पिता का प्यार, हाईकोर्ट ने कहा- मौजूदा कानून में यह दिलवाना संभव नहीं है

हाईकोर्ट ने माना- माता-पिता का प्यार व साथ बच्चों का नैसर्गिक अधिकार, सरकार कानून में संशोधन के लिए कदम उठाए

Bhaskar News | Last Modified - Dec 14, 2017, 05:11 AM IST

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    जयपुर. माता-पिता के बीच तलाक के बाद उनके बच्चे की भावनाएं क्या हैं? वह क्या चाहता है? ..और कानून इसमें उसकी क्या मदद कर सकता है, इसकी बानगी हाईकोर्ट के इजलास में सुनी गई। मामला तलाक के बाद भरण-पोषण का है। तलाकशुदा माता-पिता के 10 साल के बेटे ने हाईकोर्ट में प्रार्थना पत्र देकर कहा- मुझे भरण-पोषण में पापा का साथ और उनका प्यार दिला दो। पैसा नहीं चाहिए। ...जवाब में कोर्ट बच्चे की भावना को समझा और कहा- अवयस्क बेटे को पिता के साथ समय व्यतीत करने और उनका लाड़-प्यार, देखभाल का अधिकार सही मांग है। मजबूरी जताई- भरण पोषण दिलवाने की सीआरपीसी की धारा 125 में बेटे को उसके पिता का साथ व प्यार दिलवाने की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में विधायिका को इस संबंध में सीआरपीसी की धारा 125 में संशोधन के लिए उचित कदम उठाए जाने चाहिए।

    कोर्ट...मां-बाप के झगड़े में बच्चे को तकलीफ क्यों हो
    - अदालत ने कहा कि पति-पत्नी के बीच वैचारिक मतभेद या मनमुटाव के कारण वैवाहिक विवाद भले ही पैदा हो लेकिन इसकी प्रत्यक्ष हानि उनके मासूम व अबोध बच्चों को झेलनी पड़ती है जिनकी इस विवाद में कोई भूमिका नहीं होती।

    - बालक या बालिका के व्यक्तित्व के समग्र विकास व समुचित देखभाल के लिए उसे माता व पिता दोनों के साहचर्य, प्यार व देखभाल की जरूरत होती है और यह प्राप्त करना उनका नैसर्गिक अधिकार है।

    कानूनन...बच्चे की अर्जी खारिज
    - न्यायाधीश अजय रस्तोगी व दीपक माहेश्वरी की खंडपीठ ने यह आदेश राजकुमारी खंडेलवाल व अवयस्क बेटे की अपीलों को खारिज करते हुए दिया। वहीं हाईकोर्ट ने इस संबंध में पारिवारिक कोर्ट के अवयस्क बेटे को भरण पोषण कानून के तहत पिता का प्यार व समय दिलवाने संबंधी प्रार्थना पत्र को 24 जून 2017 के आदेश से खारिज करने को सही माना।

    - इसके अलावा हाईकोर्ट ने प्रार्थिया द्वारा पारिवारिक न्यायालय के द्वारा विवाह विच्छेद की डिक्री आदेश मई 2017 को सही करार देते हुए कहा कि इसमें अधीनस्थ कोर्ट ने कोई गलती नहीं की है। अपील में प्रार्थिया ने पारिवारिक न्यायालय के आदेशों को चुनौती दी थी।

    केस...दो साल से माता-पिता अलग रह रहे हैं
    - राजकुमारी खंडेलवाल का विवाह फरवरी 2005 में मनोज के साथ हुआ था। वे तीन साल तक साथ रहे और इस दौरान दिसंबर 2006 में उनके एक बेटा हुआ।

    - मनोज खंडेलवाल ने जनवरी 2015 में जयपुर के पारिवारिक न्यायालय में विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त करने के लिए याचिका दायर की और कहा कि प्रार्थिया उसके माता-पिता व उसके साथ नहीं रहना चाहती और अलग रहने की जिद कर रही है।

    - वह 31 अगस्त से उससे अलग रह रही है और इसके बाद से उनके बीच कोई संबंध नहीं रहे हैं। इसलिए उनका विवाह विच्छेद करवाया जाए।

    - पारिवारिक न्यायालय ने माना कि वे याचिका दायर करने से दो साल से अधिक की पूर्व की अवधि से साथ नहीं रह रहे थे और यह हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 (1) की उपधाराओं के तहत विवाह विच्छेद का आधार है। पारिवारिक न्यायालय ने विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर निर्णय दिया जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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Web Title: Rajasthan High Court Admits That Parents Love Natural Rights Of Children
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