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हाईकोर्ट ने कहा- तलाक के केस में बच्चे की इच्छा भी पूछी जाए

सवाई माधोपुर की फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर कस्टडी पर सुनवाई के लिए हाईकोर्ट का आदेश

Danik Bhaskar | Jan 21, 2018, 05:33 AM IST

जयपुर. परिवारों के टूटने का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर ही होता है और विडंबना ये है कि विवाद में उनका पक्ष ही कोई नहीं पूछता। माता-पिता के अलग होने के फैसले में उनका न कोई मत होता है और अक्सर तो उनसे ये भी नहीं पूछा जाता कि वे किसके साथ रहना चाहते हैं। ऐसे ही एक मामले में पारिवारिक अदालत के फैसले को रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि अभिरक्षा तय करते समय बच्चों की इच्छा भी जाननी चाहिए।


फैमिली कोर्ट, सवाई माधोपुर के 28 अप्रैल, 2017 को एक पारिवारिक विवाद के मामले में सात साल के बच्चे की अभिरक्षा अलग हो चुके माता-पिता में से पिता को दे दी थी। हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर मामला वापस फैमिली कोर्ट को लौटा दिया। मां ने की थी फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नांद्रजोग व न्यायाधीश जीआर मूलचंदानी की खंडपीठ ने यह आदेश बच्चे की मां लक्ष्मा की अपील का निपटारा करते हुए दिया।

मामले के अनुसार, प्रार्थिया लक्ष्मा की शादी भागचंद मीणा के साथ हुई थी। उनके एक बेटा सोनू हुआ। भागचंद ने बेटे की अभिरक्षा के लिए 2016 में फैमिली कोर्ट सवाई माधोपुर में प्रार्थना पत्र दायर किया। फैमिली कोर्ट ने बच्चे की आयु 5 साल से अधिक होने के आधार पर पिता को उसका संरक्षक मानते हुए उसकी अभिरक्षा पिता को दे दी।

इस आदेश को प्रार्थिया ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट ने बच्चे की अभिरक्षा बिना किसी साक्ष्य के उसके पिता को दी है। इसलिए फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया जाए। अदालत ने प्रार्थिया की अपील का निपटारा कर फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।

यह कहा हाईकोर्ट ने

अदालत ने फैमिली कोर्ट को कहा वह बच्चे के कानूनी संरक्षक के संबंध में केस में नए सिरे से साक्ष्यों के आधार पर सुनवाई करे। अदालत ने कहा बच्चे के अभिरक्षा के अधिकार तय नहीं हो जाते तब तक मां को उससे मिलने दिया जाए ताकि मां और बेटे के बीच का बंधन भी बना रहे। अदालत ने साथ ही कहा कि अभिरक्षा के मामलों में बच्चे से भी उसकी इच्छा पूछा जाना जरूरी है।