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दमकल बेडा खुद बेदम; सौ दमकलें होनी चाहिए...51 ही हैं, कर्मचारियों की आधी-अधूरी ट्रेनिंग

भास्कर ने शहर में फायर फाइटिंग सिस्टम की पड़ताल की तो चौंकाने वाली हकीकत सामने आई।

Danik Bhaskar | Jan 16, 2018, 04:31 AM IST

जयपुर. करीब पचास लाख की आबादी वाले जयपुर शहर में आग की घटनाओं से निपटने वाला फायर ब्रिगेड का बेड़ा खुद ही इस हालत में नहीं है कि वह किसी बड़ी अग्नि परीक्षा में पास हो सके। नेशनल फायर प्रोटेक्शन एसो.(एनएफपीए) के नाॅर्म्स के मुताबिक हर 50 हजार की आबादी पर एक फायर ब्रिगेड गाड़ी जरूरी है, लेकिन शहर महज 51 गाड़ियों के भरोसे चल रहा है। नॉर्म्स के अनुसार होनी चाहिए 100 गाड़ियां। बेड़े के अंदरूनी खोखलेपन की कहानी यहीं तक सीमित नहीं है। फायर ब्रिगेड में 850 कर्मियों की जरूरत है, पर सिर्फ 269 ही तैनात हैं। इनमें से सौ तो संविदा पर लगे ऐसे लोग हैं, जो बड़ी घटना का सामना करने के लिए अनट्रेंड हैं।


विद्याधरनगर में शार्ट सर्किट से लगी आग में पांच बेकसूर की मौत के बाद शहर का फायर ब्रिगेड बेड़ा कठघरे में है। जब भास्कर ने शहर के फायर फाइटिंग सिस्टम की पूरी पड़ताल की तो एक से बढ़कर एक गंभीर खामियों का पिटारा खुलता चला गया। एक बेहद खतरनाक चूक देखिए...पूरे फायर ब्रिगेड बेड़े में एक भी रेस्क्यू टेंडर नहीं जो कटिंग और ब्रेकिंग के अत्याधुनिक साजो-सामान से युक्त किट से लैस हो। यह भी सामने आया कि आगजनी से जयपुर ही नहीं पूरा प्रदेश ही असुरक्षित है।


सरकार ने अब तक प्रदेश के 192 नगरीय निकायों में से तकरीबन आधों में फायर स्टेशन और फायर की गाड़ियों का इंतजाम ही नहीं कर रखा है। नगरपालिका सर्विसेज एक्ट 1963, 2009 में फायर फाइटिंग के स्पष्ट तौर पर प्रावधान, बॉयलॉज तक नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें सिर्फ आग बुझाने की व्यवस्था ही निर्दिष्ट है।

ये 5 बड़ी कमियां...

1. डोर ब्रेकर्स, कटर्स, एक भी रेस्क्यू टेंडर नहीं
जयपुर जैसे शहर में फायर ब्रिगेड के बेड़े एक भी रेस्क्यू टेंडर नहीं है। रेस्क्यू टेंडर वह गाड़ी होती है जिसमें डोर ब्रेकर्स, कटर्स, स्प्रेडर, चीजल, हथौड़े, फावड़ा, कुल्हाड़ा, बोल्ट कटर जैसे साधन होते हैं। बडे़ भवन, बिल्डिंग में अग्निकांड पर जिंदगी बचाने के लिए सबसे पहले इन्हीं की जरूरत पड़ती है। फायर ब्रिगेड बेड़ा इन्हीं साधनों के लिए जूझता रहता है। विद्याधरनगर हादसे की बड़ी वजह यह खामियां ही रह गई। फायर फाइटिंग उपकरणों से लैस टेंडर होती तो कई जिंदगियों को बचाया जा सकता था।


2. 11 फायर स्टेशन, 5 के प्रस्ताव कागजों में
जयपुर में 11 फायर स्टेशन हैं जो तेजी से फैल रहे शहर के लिए काफी नहीं हैं। नगर निगम की फायर समिति ने करीब डेढ़ साल पहले 5 नए स्टेशनों का प्रस्ताव मंजूर किया, लेकिन यह कागजों में ही रह गया। ये प्रस्तावित स्टेशन हैं-चौगान के पास, मानसरोवर पत्रकार कॉलोनी, वैशाली-पृथ्वीराज नगर, आगरा रोड, सीकर रोड पर। फिलहाल शहर में इन जगहों पर फायर स्टेशन हैं-बनीपार्क, घाटगेट, वीकेआई, मानसरोवर, सीतापुरा, मालवीयनगर, आमेर, बिंदायका, झोटवाड़ा, बाईस गोदाम, सी एमआर।

3. जरूरत 850 दमकलकर्मियों की, तैनात सिर्फ 269
फायर ब्रिगेड बेड़े में विभिन्न संवर्ग के 169 पद तो तब सृजित हुए थे जब शहर की आबादी 10 लाख हुआ करती थी। बदकिस्मती यह है कि आज 50 लाख की आबादी पर भी यही पद हैं। जो 100 अतिरिक्त भर्तियां हुई हैं, वे संविदा पर हैं। बड़े हादसों के लिए ये लोग इसलिए तैयार नहीं कि इनके लिए कोई लॉन्ग टर्म के प्रॉपर ट्रेनिंग प्रोग्राम नहीं। इन्हें सिर्फ 15 दिन की ट्रेनिंग मिली है। जानकारों के अनुसार फायर शाखा के तीन करोड़ के बजट में से 80 फीसदी राशि तो इनके वेतन पर ही खर्च हो जाती है।

4. फायर सूट ही नहीं, कैसे बचेे लपटों से जिंदगी?
आग में फंसे लोगों को निकालने के लिए सबसे अहम संसाधन फायर सूट बेड़े में होना जरूरी है, लेकिन फायर ब्रिगेड के पास यह नहीं है। ऐसे में धधकती लपटों के बीच से जिंदगी को
बचाना आसान नहीं है। एल्युमिनियम और एसबेस्टस के बने इस सूट को पहनकर फायरमैन लोगों को बचा सकते हैं। ब्रीथिंग एंप्रेडस और गैस मास्क भी यहां नहीं हैं। इस तरह के फायर सूट मुंबई और कुछ अन्य बड़े महानगरों के अग्निशमन बेड़ों के पास हैं।


5. 42 मीटर की ऊंचाई के बाद भगवान भरोसे
फायर ब्रिगेड शाखा के पासा फिनलैंड से आयातित ब्राटोस्काई लिफ्ट वाल्वो गाड़ी है जो 42 मीटर तक की ऊंचाई पर आग बुझाने में सक्षम है। 50 लाख की आबादी के लिए यह सिर्फ एक ही गाड़ी है। जो बनीपार्क के फायर स्टेशन पर रहती है। जेडीए-निगम की ओर से 65-70 मीटर तक के हाई राइजिंग बिल्डिंगों को एनओसी दी जाती है, ऐसे में ये भवन किसी बड़े हादसे में रामभरोसे ही हैं। इसके उलट जयपुर की संकरी गलियों में अग्निकांडों से निबटने के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं।

निकायों में ऐसी लड़ाई कि फायर सेस के 50 करोड़ अटके
जेडीए की ओर से फायर सेस के पेटे में पिछले चार साल में करीब 50 करोड़ की वसूली की गई। नगर निगम ने इस राशि की कई बार जेडीए से मांग की है ताकि इससे इक्यूपमेंट खरीदे जा सकें, लेकिन अब तक यह राशि अटकी ही पड़ी है। यह पैसा जेडीए के पास ही है।


ट्रेनिंग सेंटर खोलने के प्रयास
संसाधन, जरूरत के मुताबिक कर्मचारियों की कमी है। इसे दूर करने, नियमित ट्रेनिंग के लिए ट्रेनिंग सेंटर खोलने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। जल्द से जल्द कई इंतजाम किए जाएंगे।
-शिप्रा शर्मा, उपायुक्त फायर


विशेषज्ञ का नजरिया
पूरा सिस्टम ही कोलेप्स हो गया है। फायर ब्रिगेड के पास ज्यादातर कंडम गाड़ियां हैं। न तो पर्याप्त पोस्ट हैं और न ही ट्रेनिंग के इंतजाम। सरकार को पूरा सिस्टम कंट्रोल करना चाहिए नहीं तो हालात और खतरनाक हो सकते हैं।
-ईश्वरलाल जाट, रिटायर्ड सीएफओ (आईओसी अग्निकांड 2009 के वक्त सीएफओ के रूप में बड़ी जिम्मेदारी निभाई)