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जेडीए की गुहार पर हाईकोर्ट ने कहा- निचली अदालतें कैसे सुन रही हैं जेडीए एक्ट के केस

कहा-क्यों न ऐसे केसों के लिए निषेधाज्ञा याचिका दायर की जाए, एक केस में सुनवाई पर रोक

Bhaskar News | Last Modified - Mar 04, 2018, 03:42 AM IST

जेडीए की गुहार पर हाईकोर्ट ने कहा- निचली अदालतें कैसे सुन रही हैं जेडीए एक्ट के केस

जयपुर. जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) वैसे ही भूमि विवादों को निपटाने में ढिलाई के आरोपों से घिरा रहता है। उस पर तुर्रा ये कि जेडीए एक्ट से जुड़े केसों में लोग अधीनस्थ अदालतों में याचिका दायर करते हैं और अदालतें इन याचिकाओं पर सुनवाई भी शुरू कर देती हैं, जबकि नियमत: इन मामलों की सुनवाई का अधिकार सिर्फ जेडीए ट्रिब्युनल को है। अब जेडीए की ओर से दायर याचिका पर हाईकोर्ट ने पूछा है कि अधीनस्थ अदालतें इन मामलों की सुनवाई क्यों कर रही हैं? अपनी याचिका में जेडीए ने कहा है कि इन मामलों की सुनवाई न सिर्फ अधीनस्थ अदालतों के क्षेत्राधिकार से बाहर है, बल्कि इसकी वजह से जेडीए की कार्रवाई भी प्रभावित हो रही है।


हाईकोर्ट ने कहा कि क्यों न अधीनस्थ कोर्ट द्वारा बिना क्षेत्राधिकार के सुने जा रहे जेडीए से संबंधित केसों के लिए निषेधाज्ञा याचिका दायर की जाए। वहीं अदालत ने इस संबंध में जेडीए एक्ट से संबंधित एक केस त्रिपुरारी बिल्डकॉन प्राइवेट लिमिटेड में अधीनस्थ कोर्ट की कार्रवाई पर रोक लगा दी।

सिविल दावा मेंटेनेबल नहीं
न्यायाधीश एम.एन.भंडारी ने यह अंतरिम निर्देश जेडीए के सचिव व अन्य अफसरों की याचिका पर दिया। जेडीए के अधिवक्ता अमित कुड़ी ने अदालत को बताया कि जेडीए एक्ट की धारा 99 के तहत जेडीए के खिलाफ सिविल दावा मेंटेनेबल नहीं है। अधीनस्थ कोर्ट जेडीए एक्ट से संबंधित केसों की सुनवाई नहीं कर सकती। इनकी सुनवाई जेडीए ट्रिब्यूनल में होनी चाहिए। लेकिन फिर भी जेडीए एक्ट के तहत की गई कार्रवाई को पक्षकारों द्वारा सिविल दावा दायर कर अधीनस्थ कोर्ट में चुनौती दी जा रही है। जबकि अधीनस्थ कोर्ट को इनकी सुनवाई का क्षेत्राधिकार ही नहीं है। इसलिए अधीनस्थ कोर्ट को इन केसों की सुनवाई करने पर पाबंदी लगाई जाए।


बिना छानबीन किए ही सुनवाई
अदालत ने कहा कि याचिका में ऐसा दिख रहा है कि अधीनस्थ कोर्ट जेडीए एक्ट की धारा 99 की अनदेखी करते हुए जेडीए के खिलाफ सिविल केसों की सुनवाई कर रही है। यह भी छानबीन नहीं की जा रही कि केस जेडीए के खिलाफ है या किसी अन्य पक्षकार के। ऐसे में यदि जेडीए के खिलाफ केस में पक्षकार को राहत मिलती है तो वह मेंटेनेबल नहीं है। ऐसे में अधीनस्थ कोर्ट से यह अपेक्षा की जाती है कि वह मामले की और मांगी गई राहत की छानबीन करे ताकि उनके क्षेत्राधिकार का दुरुपयोग नहीं हो सके। ऐसे में अपने क्षेत्राधिकार की अनदेखी कर दूसरी कोर्ट द्वारा इन केसों की सुनवाई की जा रही है।

सिविल कोर्ट में 3000 मामले कई केस तो 10 साल पुराने

जेडीए एक्ट के मुताबिक मामलों की सुनवाई के लिए कोर्ट निर्धारित हैं। हालांकि इसके इतर कुछ मामले सिविल कोर्ट में जा रहे हैं। जिसे लेकर जेडीए ने रिट लगाई थी। सामने आया कि सिविल कोर्ट में करीब 3000 मामले चल रहे हैं। इनमें कई तो 10 साल पुराने हैं। जेडीए का तर्क है कि जब एक्ट में कोर्ट निर्धारित है तो आखिर दूसरे कोर्ट में मामले जाने से उनकी भागदौड़ होती है, वहीं केस की पैरवी आदि में भी उलझन-परेशानी बनी रहती है।


मुख्य कोर्ट में ही सबसे कम
जेडीए से जुड़े करीब 10 हजार से ज्यादा केस चल रहे हैं। इनमें ढाई हजार हाईकोर्ट में, सिविल कोर्ट में 3000 से ज्यादा, रेवेन्यू अदालतों में करीब ढाई हजार, वहीं जेडीए के लिए बने ट्रिब्यूनल कोर्ट में सबसे कम करीब 1500 से 2000 मामले हैं। जेडीए चाहता है कि सिविल कोर्ट से जुड़े मामले यहां ट्रांसफर हो तो सुनवाई भी जल्दी हो, क्योंकि सिविल कोर्ट में पहले से केस ज्यादा रहते हैं। वहीं कुछ ऐसी पार्टियां जो कि मामलों को गुमराह करने के लिए दूसरे कोर्ट में ले जाकर स्टे ले लेती है और इस दौरान अवैध निर्माण जैसे मंसूबे पूरे हो जाते हैं, उन पर अंकुश लगे। कई ऐसे मामलों में जेडीए कार्मिकों की ही अनदेखी और मिलीभगत होती है।


जब जेडीए एक्ट में प्रोविजन हैं और कोर्ट निर्धारित है तो जेडीए एक्ट से संबंधित मामले उन्हीं कोर्ट में लाए जाएं, इसके लिए हमने रिट लगाई है। ताकि मामलों की प्राथमिकता के आधार पर समय रहते सुनवाई हो सके।
-अशोक सिंह, लॉ डायरेक्टर, जेडीए

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Web Title: jedie ki gauhaar par highkort ne khaa- nichali adaalten kaise sun rhi hain jedie ekt ke kes
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