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गोलियों से छलनी है यह पहाड़, छेंद इतने की आप गिन नहीं सकते...

बाबर ने तोपखाने और बंदूकों के बल पर सिर्फ 10 घंटे में राणा सांगा की सेना को हरा दिया।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jan 29, 2018, 11:32 AM IST

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    इनसेट में राणा सांगा की तस्वीर। साथ ही गोलियों से छलनी पहाड़ की फोटो।

    जयपुर. भरतपुर-धौलपुर रोड पर रूपवास के निकट गांव खानवा, जहां 17 मार्च 1527 में बाबर और राणा सांगा के बीच युद्ध लड़ा गया। यह मैदान पहली बार युद्ध में इस्तेमाल की गई तकनीक का भी गवाह है। बाबर ने तोपखाने और बंदूकों के बल पर सिर्फ 10 घंटे में राणा सांगा की सेना को हरा दिया। इस युद्ध में हुई तबाही के निशान 490 साल बाद आज भी पहाडिय़ों पर मौजूद हैं। तोपखाने और बंदूकों ने पहाड़ियों को छलनी कर दिया था।20 हजार से अधिक सैनिक मारे गए...

    - युद्ध में महाराणा संग्रामसिंह (राणा सांगा) आंख में तीर लगने से घायल हो गए। उन्हें युद्ध स्थल से बाहर पालकी में ले जाने से सेना में निराशा छा गई। साथ ही कुछ सैनिकों ने पाला बदल कर बाबर से हाथ मिला लिया, इसलिए सुबह 9.30 बजे प्रारंभ हुए युद्ध का परिणाम शाम 7.30 बजे बाबर के पक्ष में हो गया।
    - गांव खानवा में राजस्थान स्टेट हैरिटेज प्रमोशन अथॉरिटी की ओर से राणा सांगा स्मारक वर्ष 2007 में बनाया गया। जो एक पहाड़ी पर बना है।
    - स्मारक स्थल पर भारत के इतिहास के अहम मोड़ वाले इस युद्ध में भाग लेने वाले 40 योद्धाओं की मूर्तियां भी गैलरी में लगाई गई है।

    (12 अप्रैल 1482 को जन्मे राणा सांगा की 30 जनवरी 1528 को मृत्यु हुई थी।) इस मौके परDainikBhaskar.comआगे की स्लाइड्स में बता रहा है सांगा के ऐतिहासिक युद्ध के बारे में...

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    राणा सांगा और बाबर की सांकेतिक तस्वीर।

    महाराणा संग्राम सिंह से भयभीत था बाबर
    - कर्नल टाड के अनुसार, राणा सांगा की भारी और जोश से भरी फौज को देखकर बाबर घबरा गया था। साथ ही बयाना किले में बाबर की सेना की हार हुई थी। इस कारण खानवा के युद्ध से पहले बाबर ने एक संधि प्रस्ताव राणा सांगा के पास भेजा था, जिसमें लिखा कि सारी शर्तें राणा की होंगी, जिन्हें बाबर स्वीकार करेगा। साथ ही प्रति वर्ष कुछ कर भी अदा करेगा। परंतु तंवर शिलादित्य ने यह संधि नहीं होने दी, इसलिए 16 मार्च 1527 को युद्ध की घोषणा की गई।

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    खानवा गांव के पहाड़ पर राणा सांगा का स्टेच्यू।

    बाबर ने राजपूती सेना के साहस की प्रशंसा
    - बाबर ने राजपूती सेना के साहस का बखान किया है। कथन है कि तुर्कों के पैर उखड़ गए थे। पराजय दिखाई दे रही थी। तोपखाने ने आग बरसाई तब सांगा की जीती हुई बाजी हार में बदल गई। फिर भी सांगा और उनके वीर मरते दम तक लड़ते रहे।
    - बाबर ने आगे लिखा कि वे मरना-मारना तो जानते हैं किंतु युद्ध करना नहीं जानते।
    - कनिंघम लिखता है कि बाबर के पास सेना कम थी, परंतु दूर तक मार करने वाली बड़ी-बड़ी तोपें थी, जबकि राजपूत इसको लेकर अनजान थे।

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    सदियों से छलनी है ये पहाड़।

    आंख में तीर लगने से बेहोश हो गए थे राणा
    - खानवा युद्ध के बाद ही मुगल साम्राज्य का उदय हुआ और बाबर उर्फ जाहिर उद-दिन मुहम्मद ने गाजी की उपाधि धारण की।
    - राणा सांगा इस युद्ध में बुरी तरह घायल हो गए थे। उनके शरीर में 80 घाव हो गए थे। उनका एक हाथ और पैर भी टूट गया था।
    - मूर्छित सांगा को अनुचर पालकी में डालकर बयाना और रणथंभौर ले गए। थोड़ा स्वस्थ होने पर सांगा कालपी नामक स्थान पर भावी युद्ध की तैयारी में जुट गए, किंतु 30 जनवरी 1528 को उन्हें जहर देकर मार दिया गया था।

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Web Title: Pellet Hole On Khanwa Gaon Mountain Due To Babar And Rana Sanga War
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