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ये औरतें लग्जरी फैमिली के यहां पैसे लेकर जाती हैं रोने, इसलिए दलित मुंडाते हैं सिर

रुदालियों का रोना आज भी राजस्थान के आदिवासी और पिछड़े जिलों में गूंजता है।

Dainik Bhaskar

Dec 30, 2017, 01:43 AM IST
रोती हुई रुदालियां। रोती हुई रुदालियां।

जयपुर. अपनों के लिए तो आंसू सभी बहाते हैं लेकिन ये वो महिलाएं हैं जो गैरों की मौत पर रुदन करती हैं। रोना कभी उनका पेशा था, लेकिन उन्हें आज भी गांव में ‘सामंतों’ (प्रभावशाली) की मौत पर रोने के लिए जाना ही पड़ता है। कई दिनों तक उन्हीं के घरों पर जाकर मातम मनाना पड़ता है। ये रुदालियों का रोना आज भी राजस्थान के आदिवासी और पिछड़े जिलों में गूंजता है। यहां अभी भी यहां सैकड़ों रुदालियां हैं। भास्कर ने सिरोही जिले में दर्जनों ऐसे गांव ढूंढ़ निकाले जहां आज भी रुदालियां हैं।

यह लाइव तस्वीर...भास्कर रिपोर्टर जब सिरोही के रेवदर तहसील के एक गांव में पहुंचे तो सामने रुदालियों का समूह रुदन करते हुए आ गया। पता चला किसी बड़े परिवार में मौत हुई है। रुदालियां जोर-जोर से रोती हुईं गांव में घुसीं। तस्वीर में दिखाई दे रहे पुरुष मौत पर शोक प्रकट करने जा रहे हैं।

- रेवदर इलाके में धाण, भामरा, रोहुआ, दादरला, मलावा, जोलपुर, दवली, दांतराई, रामपुरा, हाथल, वड़वज, उडवारिया, मारोल, पामेरा में हमें रुदालियों के सैकड़ों परिवार मिले।

- इस संबंध में जब भास्कर ने रेवदर विधायक जगसीराम कोली से सवाल किया तो वे बोले : पहले ऐसी परंपरा रही है। अगर आज भी ऐसा है तो हम इसे बंद करवाएंगे।

बेजुबान सरपंच : रुदाली प्रथा के मामले में हमने सिरोही जिले के सिरोडी सरपंच पारुल, उडवारिया की सरपंच शारदा देवी, धाण सरपंच छाया देवी, जोलपुर सरपंच ज्योतिका राजपूत, रोहुआ सरपंच रमेश कुमार से बात करने की कोशिश की। इन सभी ने इस मामले में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।

दलित परिवार में बच्चे से बूढे़ तक का मुंडन
- सिरोही जिले के रेवदर कस्बे से 09 किलोमीटर दूर धाण गांव के गणेशाराम सामंतों की मौत पर शोक गीत गाते हैं।

- गणेशाराम बताते हैं पिछले 50 साल में उन्होंने दर्जनों सामंतों और ठिकानेदारों की मौत पर मुंडन करवाया है। बदले में ठिकानेदार उन्हें इनाम भी देते हैं।

- जोलपुर ठिकाने के पूर्व ठिकानेदार की मौत पर पांच गांवों के दलित परिवारों ने मुंडन करवाया...बच्चे से लेकर बूढ़े तक।

200 सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी

- यह प्रथा करीब दो सौ सालों से चली आ रही है। रोना कमजोरी की निशानी माना जाता था। इसलिए रजवाड़ों-ठिकानेदार परिवारों में मौत पर बाहर से महिलाआें को बुलाया जाता था।

- आज तो जमींदार परिवारों से जुड़े घरों में भी इन रुदालियों को रोने के लिए जाना पड़ता है।

- हाथल गांव की रुदाली सुखी कहती हैं कि अगर हम रोने नहीं जाएं तो उसका खामियाजा भी उठाना पड़ता है।

- खामियाजा यानी...गांव से निकाल देना, मारपीट, बहिष्कार इसलिए हम बिना बुलाए ही रोने चले जाते हैं।

एडीजी बोले : रुदाली पर कोई कानून नहीं, ऐसे में कोई कार्रवाई नहीं कर पाते
- डायन प्रताड़ना निवारण कानून की तरह इस प्रथा के खिलाफ कोई स्पेस्फिक कानून तो है नहीं, इसलिए पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर पाती है। इसकी रोकथाम के लिए तो समाज को ही पहल करनी होगी। -एमएल लाठर, एडीजी (सिविल राइट्स)

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रोती हुई रुदालियां।रोती हुई रुदालियां।
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