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एसएमएस मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल- हॉस्पिटल सुपरिटेंडेंट में ठनी

अधीक्षक रहते हुए मैं कमेटी में सदस्य कैसे रह सकता हूं : मीणा

Danik Bhaskar | Dec 09, 2017, 04:58 AM IST

जयपुर. राजस्थान के सबसे बड़े एसएमएस अस्पताल की व्यवस्थाएं सुधारने में फिसड्डी साबित हो रहे बड़े डॉक्टर में इन दिनों अधिकारों को लेकर शीतयुद्ध चल रहा है। ताजा मामला एसएमएस अस्पताल के लिए गठित होने वाली विभिन्न कमेटियों से जुड़ा है, जिसको लेकर अस्पताल अधीक्षक डीएस मीणा ने मेडिकल कॉलेज प्राचार्य यूएस अग्रवाल की कार्यशैली पर ही सवाल खड़े किए है। मीणा ने बाकायदा सरकार को पत्र लिखकर अपनी पीड़ा जाहिर की है।

मेडिकल शिक्षा सचिव आनंद कुमार को लिखे पत्र में कहा गया है कि अस्पताल के सर्वाधिकार उनके पास मौजूद है, फिर भी प्राचार्य अस्पताल के लिए गठित होने वाली कमेटियों में वाइस प्रिसिंपल को समन्वयक बना रहे हैं, जबकि उन्हें बतौर सदस्य कमेटी में शामिल किया जा रहा है। मीणा ने इस मामले में सरकार से हस्तक्षेप का आग्रह किया है।


यह है मामला
डॉक्टर्स और अस्पताल संबंधित अन्य शिकायते समय-समय पर सरकार के पास जाती है। इन शिकायतों की जांच के लिए सरकार मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल को पत्र लिखती है। प्रिंसिपल अपने स्तर पर जांच मेडिकल के वाइस प्रिंसिपल को सौंप देता है। इसमें अधीक्षक को बतौर सदस्य नियुक्त किया जाता है। ऐसे में मीणा का कहना है कि वे बतौर अधीक्षक और सीनियर रहते हुए वे कमेटी का सदस्य कैसे बन रह सकते हैं।

अधीक्षक बोले- यह तो ऐसे हुआ जैसे थानेदार को अध्यक्ष और एसपी को सदस्य बना दिया जाए

अस्पताल अधीक्षक मीणा ने कहा- किसी कमेटी का समन्वयक मेडिकल कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल को बनाया जा रहा है और उसमें सदस्य अधीक्षक को नियुक्त किया जा रहा है तो गलत है, क्योंकि अधीक्षक की नियुक्ति सरकार स्तर पर होती है और अस्पताल का एचओडी भी होता, जबकि वाइस प्रिंसिपल की अस्पताल स्तर पर। ऐसे में एचओडी वाइस प्रिंसिपल के अंडर में कैसे रह सकता है। अगर अग्रवाल स्वयं जांच करते हैं तो मुझे उसमें कोई आपत्ति नहीं है। यह तो उसी तरह हो गया कि पुलिस की किसी जांच कमेटी में थानेदार को चेयरमेन बना दिया जाए और एसपी को सदस्य।

सचिव ने कहा- सब मैं करुंगा तो डिप्टी-ज्वाइंट सेक्रेट्री क्या करेंगे
मेडिकल शिक्षा सचिव आनंद कुमार ने कहा- सरकार में हम बैठे है। हर चीज काम अगर मैं ही करूंगा तो मेरे डिप्टी -ज्वाइंट सेक्रेट्री तो कुछ कर ही नहीं पाएंगे। मेरे स्तर पर चिट्टी-पत्री लिखना और जांच का काम करेंगे ही। वैसे ही अस्पताल में है अगर प्रिंसिपल तो हर काम कर नहीं सकता। बाकी डॉक्टर्स से भी काम करना है। ऐसे में वर्तमान में इस पत्र को जरूरी नहीं समझा है। आगे कुछ होता है तो विचार किया जाएगा।

बिल्ली को कैसे दी जा सकती है दूध की रखवाली

पूरे मामले सवाल खड़ा हो रहा है बिल्ली को दूध की रखवाली कैसे दी जा सकती है। यानी अधीक्षक को अस्पताल और डॉक्टर्स के खिलाफ जांच की कमेटी का चेयरमेन बना दिया जाता है तो निष्पक्ष जांच आने में संदेह है।

प्रिंसीपल ने कहा- मीणा का पत्र सचिव को भेजा

मेडिकल कॉलेज प्रिंसीपल यूएस अग्रवाल ने कहा- मैंने अधीक्षक के पत्र का जवाब मेडिकल सचिव को भेज दिया है। मैं कोई भी जांच अपने स्तर पर वाइस प्रिंसिपल को दे सकता हूंै। यानी जांच मैं कर रहा हूं। ऐसे में मीणा को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इसके बाद भी सरकार निर्णय में बदलाव कर सकती है।