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यह कैसा ट्रायल ! खिलाड़ी नेट्स में और सलेक्टर्स मोबाइल पर

जिला संघों के पदाधिकारी भी अपने-अपने जिलों के प्लेयर्स के सलेक्शन के लिए लगातार सलेक्टर्स पर दबाव बनाते हैं

Danik Bhaskar | Dec 16, 2017, 05:36 AM IST
सलेक्शन ट्रायल के दौरान फोन पर बात करते सुखविंदर सिंह सलेक्शन ट्रायल के दौरान फोन पर बात करते सुखविंदर सिंह

जयपुर. 1400 बच्चे, 4 दिन, 6 सलेक्टर्स। अंडर-14 के चैलेंजर के लिए टीमें चुननी हैं छह। छह टीमों के लिए चुने जाने हैं 90 बच्चे। कैसे संभव है। ज्यादातर सलेक्टर्स खुद मानते हैं कि इतने कम समय से किसी की प्रतिभा को पहचानना संभव नहीं है। ऐसे में सलेक्टर्स सिर्फ और सिर्फ उन्हीं बच्चों पर ध्यान दे पाते हैं जिनके बारे में या तो उनके मोबाइल में कोई मैसेज आ जाए या फिर मोबाइल पर किसी बच्चे के बारे में फोन आ जाए।


राजस्थान के 33 जिलों से बच्चों को ट्रायल दिलाने के लिए लेकर आए माता-पिता इस सलेक्शन प्रक्रिया से खुश नहीं हैं। उनका सबसे पहला सवाल ही यह है कि आखिर सलेक्टर्स के हाथों में मोबाइल फोन क्यों हैं? ऐसे वे कैसे फेयर ट्रायल ले पाएंगे। ट्रायल के समय भी वे फोन पर बात करते नजर आते हैं।

इतना ही नहीं, कुछ जिलों के पदाधिकारी भी सलेक्टर्स पर अपने-अपने जिलोंं के बच्चों के सेलेक्शन के लिए दबाव बनाए रखते हैं।

आरसीए के संयुक्त सचिव महेंद्र नाहर से जब इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, इतने बच्चों के बीच सेलेक्शन फेयर हो ही नहीं सकता। इससे बेहतर होता कि हर जिला अपने यहां से 10-10, 20-20 बेस्ट बच्चे भेज देता। जिलों की क्रिकेट नहीं होने से भी इस तरह की समस्याएं आ रही हैं।


इन सलेक्टर्स में से एक ने तो यह भी सवाल किया कि जब पैरेंट्स को ट्रायल के समय आरसीए एकेडमी में आने की इजाजत नहीं है तो फिर जिला संघों के कुछ पदाधिकारी क्यों अंदर आ जाते हैं। ट्रायल के समय इन पर रोक क्यों नहीं लगती। ये लोग भी तो हमारे ऊपर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रैशर बनाने की कोशिश करते हैं।

हमसे कभी किसी ने कहा ही नहीं कि मोबाइल साथ नहीं रखना। वैसे हमारा फोन साइलेंट ही रहता है। जब कोई महत्वपूर्ण फोन आता है तभी यूज करते हैं। अगर कहा जाएगा कि फोन साथ नहीं रखना तो नहीं रखेंगे।

- सुखविंदर, सेलेक्टर्स


वैसे तो हम मोबाइल ज्यादा यूज नहीं करते। एक-एक बैच के बाद जब समय मिलता है तभी थोड़ा-बहुत देखते हैं। कभी कोई घर वगैरह से मैसेज आ गया या फिर किसी मैच का स्कोर देखना हो तभी यूज करते हैं।

-प्रमोद यादव, सेलेक्टर्स

आरसीए पदािधकारी बोले-मोबाइल तो नहीं होना चािहए

ये तो सच बात है। सलेक्शन ट्रायल के समय सलेक्टर्स के हाथ में मोबाइल नहीं होना चाहिए। अगर वाकई इन लोगों को आपस में बात करने की जरूरत है तो उन्हें वॉकी-टॉकी दिए जाने चाहिए।
-महेंद्र सिंह नाहर, संयुक्त सचिव, आरसीए

सलेक्शन ट्रायल के समय मोबाइल पूरी तरह से प्रतिबंधित होना चाहिए। किसी भी सलेक्टर्स के पास मोबाइल नहीं होना चाहिए। किसी भी सलेक्टर्स को किसी के भी दबाव में काम नहीं करना चाहिए।
-पिंकेश पोरवाल, कोषाध्यक्ष, आरसीए

यहां ट्रायल के नाम पर हो रहा है खिलवाड़

मैं पिछले दो दिन से देख रही हूं। बच्चें नेट्स में ट्रायल दे रहे हैं और सलेक्टर्स बीच-बीच में मोबाइल पर बात करने लगते हैं। उन्हें रोकना चािहए। उन्हें पूरी तरह से बच्चों के ट्रायल में ध्यान देना चाहिए।
-सुनिधि, ट्रायल देने आए एक बच्चे की मांं


हम लोग तो बाहर बैठे रहते हैं लेकिन कुछ लोग अंदर घुस कर बार-बार सेलेक्टर्स के पास जाकर उन्हें परेशान करते हैं। मैं नहीं जानता कि ये लोग कौन हैं लेकिन इन्हें भी रोकना चाहिए।
-राजेंदर, ट्रायल देने आए बच्चे के पिता

अगर वाकई फेयर ट्रायल कराना है तो सबसे पहले सलेक्टर्स के हाथों से मोबाइल वापस लेना चाहिए। कम से कम उस समय उनके पास मोबाइल नहीं होना चाहिए जब वे ट्रायल ले रहे हैं।
-तनवीर, ट्रायल देने आए खिलाड़ी का भाई

मैं छोटे भाई को ट्रायल दिलाने लाया हूं। पिछले तीन दिन से जयपुर में होटल का किराया देकर रह रहा हूं। यहां ट्रायल के नाम पर खिलवाड़ हो रहा है। 8-10 गेंद में प्रतिभा पहचानी जा रही हैै।
-सुरेंद्र, ट्रायल देने आए एक बच्चे का बड़ा भाई

कुलदीप माथुर। कुलदीप माथुर।
प्रमोद यादव, सेलेक्टर्स प्रमोद यादव, सेलेक्टर्स