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PCPNDT में 22% को सजा, सिर्फ 21 डॉक्टरों का रजिस्ट्रेशन सस्पेंड

सजा नहीं मिलने पर बेखौफ एक्ट का उल्लंघन

संजीव शर्मा / सुरेन्द्र स्वामी | Last Modified - Dec 29, 2017, 06:43 AM IST

PCPNDT में 22% को सजा, सिर्फ 21 डॉक्टरों का रजिस्ट्रेशन सस्पेंड

जयपुर. राज्य सरकार भले ही कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम के अभियान चलाकर पीसीपीएनडीटी कानून का उल्लंघन करने वालों को पकड़कर कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के दावे कर रही है। लेकिन यदि दोषियों को पीसीपीएनडीटी कोर्ट से मिलने वाली सजा की बात करें तो अभी तक प्रदेशभर में लंबित मुकदमों के अनुसार कानून के तहत केवल 22 फीसदी अभियुक्तों को सजा मिली है। हालांकि हाईकोर्ट ने पीसीपीएनडीटी से संबंधित एक मुकदमे में जुलाई 2017 में निर्देश दिया था कि इन मुकदमों की ट्रायल जल्द पूरी की जाए।

यदि कोर्ट से मिली अभियुक्तों की सजा के आंकड़ों पर गौर करें तो ये आंकड़े बताते हैं कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी इन केसों की ट्रायल समय पर पूरी नहीं हो पा रही। हालांकि राज्य की पीसीपीएनडीटी सेल ने वर्ष 2009 से भ्रूण जांच करने वालों के खिलाफ डिकोय ऑपरेशन कर दोषियों केे खिलाफ कार्रवाई कर रही है।

671 परिवाद में सिर्फ 147 को ही सजा मिली

आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में पीसीपीएनडीटी एक्ट के उल्लंघन के 671 परिवाद दर्ज हुए थे। इनमें 147 केसों में सजा मिली है और बाकी मामले कोर्ट में हैं। कोर्ट में इन केसों के लंबित होने का मुख्य कारण आरोपियों के जमानत लेने के बाद मामले में पैरवी को कमजोर कर दिया जाता है और अन्य कई तरीकों से केस की ट्रायल को प्रभावित किया जाता है। पीसीपीएनडीटी कानून के उल्लंघन के मामले में प्रदेशभर में अभी तक केवल दोषी 21 डाक्टरों के पंजीकरण का ही राजस्थान मेडिकल कौंसिल से निलंबन हुआ है। बाकी डॉक्टर्स के मामले लंबित चल रहे हैं।

कोई भी कर सकता है शिकायत : हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने पीसीपीएनडीटी एक्ट से जुड़े एक मामले में डॉ. रवि महावर व 49 अन्य की याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा था कि सर्च केवल अधिकृत अधिकारी करे ऐसा नहीं कह सकते। केन्द्र, राज्य सरकार या प्राधिकृत अधिकारी का शिकायत दर्ज कराना जरूरी नहीं है बल्कि निजी व्यक्ति भी शिकायत दर्ज करा सकता है।


इसलिए हो रही है देरी

इन मुकदमों के निर्णय में देरी का मुख्य कारण आरोपियों की ओर से केस की ट्रायल को लंबित रखना है। आरोपियों की ओर से ट्रायल को प्रभावित करने के लिए केस में लंबी तारीखें लेती हैं। यदि किसी केस में आरोपियों के खिलाफ अधीनस्थ कोर्ट प्रसंज्ञान लेकर चार्ज तय भी कर देती है तो वे उसे हाईकोर्ट में चुनौती देते हैं। हाईकोर्ट में मामला लंबित होने का हवाला देकर आरोपी अधीनस्थ कोर्ट की सुनवाई को प्रभावित करवाते हैं।

बेहतर काम कर रही हैं टीमें
जागरूकता कार्यक्रमों और डिकॉय ऑपरेशन से कन्या भ्रूण हत्या पर लगाम लगी है। राज्य सरकार स्तर पर किए जा रहे प्रयासों से गलत काम करने वालों में बना है। स्टेट व जिला स्तर पर पीसीपीएनडीटी टीमें बेहतर काम कर रही हैं। कोर्ट में मजबूत पक्ष रखा जा रहा है।
-नवीन जैन, अध्यक्ष, राज्य समुचित प्राधिकारी (पीसीपीएनडीटी)

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