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ऑस्ट्रेलिया तक हैं इस महिला सरपंच के चर्चे, पढ़ाई के बाद भी बनी स्कूल स्टूडेंट

यूं तो दस साल पहले पढ़ाई छोड़ चुकी थीं, लेकिन गांव की बच्चियों के लिए दोबारा पढ़ना शुरू किया। रोज स्कूल जातीं।

Danik Bhaskar | Jan 22, 2018, 02:24 AM IST

जयपुर. सिरोही की रायपुर पंचायत। यहां की सरपंच के चर्चे आॅस्ट्रेलिया तक हैं। हाल ही कॉमनवेल्थ बैंक, ऑस्ट्रेलिया ने यहां की सरपंच गीता को गर्ल्स एजुकेशन के क्षेत्र में काम करने के लिए सम्मानित किया है।

- दरअसल, गीता उस गांव से ताल्लुक रखती हैं...जहां बच्चियों को स्कूल नहीं भेजा जाता। सिर्फ इस डर से...कि कहीं वे हाथ न निकल जाएं। गीता ने इस धारणा को बदलना शुरू किया। लोग नहीं माने तो खुद स्टूडेंट बन गईं। यूं तो दस साल पहले पढ़ाई छोड़ चुकी थीं, लेकिन गांव की बच्चियों के लिए दोबारा पढ़ना शुरू किया। रोज स्कूल जातीं।

- नतीजा यह रहा कि लोगों ने भी अपनी बेटियों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया। गीता न सिर्फ स्कूल गईं बल्कि इसी तरह उन्होंने पहले दसवीं और अब 12वीं की परीक्षा पास की है।

- गीता राव के सरपंच चुने जाने से पहले रायपुर की 12वीं कक्षा तक कुल 15-16 लड़कियां पढ़ाई कर रही थी लेकिन अब हर कक्षा में 40-45 लड़कियां पढ़ रही हैं।

- स्कूल में लड़कों से ज्यादा लड़कियां हैं। पहले स्कूल में सिर्फ 3 शिक्षक थे, गीता के प्रयासों से इनकी संख्या अब 13 हो चुकी है।

अब नहीं होते बाल विवाह

- गीता का गांव अब बाल विवाह जैसी बुराई से मुक्त है। गीता अब भ्रूण हत्या को खत्म करने और नशा मुक्ति जैसे अभियान चला रही हैं। गीता का रास्ता आसान नहीं था। प्रशासन आपके गांव की तर्ज पर इन्होंने स्वयं ‘सरपंच आपके गांव’ कार्यक्रम चलाया।

- सरपंच ने लड़कियों के मनोरंजन और खेलने के लिए गांव में खंडहर हो चुके पंचायत भवन की मरम्मत कर उसे बालिका संदर्भ केंद्र बना दिया। इस काम में उनका सारद संस्थान ने सहयोग किया।

- संदर्भ केंद्र के बाहर पेंटिग्स और स्लोगन भी महिला-पुरुष समानता वाले लगाए गए हैं। गीता का कहना है कि यह इसलिए किया गया है ताकि महिलाओं के प्रति नजरिया बदले।

गीता राव बताती हैं...
उनसे पहले कोई भी महिला सरपंच उनके गांव में कुर्सी पर नहीं बैठी। उन्होंने कुर्सी पर बैठना शुरू किया तो अब महिलाएं भी उनके साथ बैठती हैं।