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दो मोबाइल वैन पर 6 डॉक्टर, सालाना Rs.31 लाख सैलरी, ड्यूटी सिर्फ 6 महीने

सरकार ढाई साल से होम्योपैथिक चिकित्सा विभाग की जिन मोबाइल वैन यूनिटों को उदयपुर और जयपुर में स्वाइन फ्लू, कैंसर,...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 02, 2018, 02:25 AM IST

सरकार ढाई साल से होम्योपैथिक चिकित्सा विभाग की जिन मोबाइल वैन यूनिटों को उदयपुर और जयपुर में स्वाइन फ्लू, कैंसर, किडनी-गॉलब्लेडर की पथरी, बच्चों में मस्तिष्क मंदता जैसी कई गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए चला रही है वे यूनिट ही वेंटिलेटर पर हैं। जो लोगों की मदद से 1-1 कमरे में होम्योपैथिक चिकित्सालय चला रहे हैं, जिनमें उन्हें ही झाडू-पोछा लगाना पड़ता है। मोबाइल वैनों पर तीन डॉक्टर उदयपुर तो तीन जयपुर में तैनात हैं। जो हर महीने सिर्फ 16-16 दिन ही ड्यूटी देते हैं। ऐसे में ये डॉक्टर साल में सिर्फ 192 दिन यानी साढ़े 6 महीने ही मरीज देखते हैं। शेष 173 दिनों में से अगर 58 दिन अवकाश के घटा दें तो भी 115 दिन की सैलरी इलाज किए बिना ही ले रहे हैं। जिनकी सालाना सैलरी ही 31 लाख रुपए से भी ज्यादा है, जबकि सरकार दोनों ही वैन के लिए हर साल डीजल खर्च 60-60 हजार देती है, जिससे रोज जा सकते हैं। इसकी वजह है कि सरकार इन वैनों को 16 दिन ही चलाने को टेंडर कर रखा है। यही नहीं, इन डॉक्टरों की टीम शहर से सटे सिर्फ 8 गांवों तक ही पहुंचती है, क्योंकि इन वैनों को पिछले ढाई साल से कागजों में परीक्षण पर ही चलाया जा रहा है। 10 लाख की यह वैन मदन मोलन मालवीय आयुर्वेद कॉलेज परिसर में खुले आसमान के नीचे खड़ी रही है।

हाल ही में ड्राइवर का टेंडर नहीं होने की वजह से उदयपुर वैन यूनिट 6 महीने तो कहीं नहीं जा सकी।

बिना अस्पताल के लगा रखे हैं पांच डॉक्टर

मोबाइल वैन यूनिट उदयपुर की चिकित्सा अधिकारी डॉ. गुंजन भट्ट की मासिक सैलरी 50 हजार, डॉ. अमित मेहता और डॉ. असमा खान की 40-40 हजार से अधिक बताई गई है। ऐसे में इनकी सालाना सैलरी ही 15.60 लाख बनती है। अधिकारी डॉ. भट्ट, डॉ. मेहता और डॉ. खान ने बताया कि उन्हें यहां एक छोटे-से कमरे का दफ्तर आयुर्वेद कॉलेज प्रशासन ने दिया है, जहां झाडू-पौंछा से लेकर दवाओं को लाने-ले जाने का काम भी खुद को ही करना पड़ता है। क्योंकि दफ्तर में न चपरासी नियुक्त है, न कंपाउंडर।

छह साल से मुसाफिर खाने में अपने स्तर पर चला रहे अस्पताल

होम्योपैथिक चिकित्सालय चमनपुरा के डॉ. किशन सालवी ने बताया कि वे 2011 से मुस्लिम मुसाफिर खाना में एक छोटे-से कमरे में अस्पताल चला रहे हैं। संस्थान किराया नहीं लेता। अस्पताल में झाडू-पोछा खुद करना पड़ता है। यहां आज तक कोई भी दूसरा डॉक्टर ड्यूटी देने नहीं पहुंचा है, जबकि इनकी प्रतिमाह पगार 50 हजार से ज्यादा है। वहीं डॉ. डीके वर्मा बताते हैं वे 2014 से सेक्टर-9 में भगवती एंड भगवती चेरिटेबल ट्रस्ट के एक कमरे में ओपीडी चलाते हैं।

ट्रस्ट किराया नहीं लेता है, लेकिन चपरासी और कंपाउंडर नहीं होने के कारण वे खुद ही अस्पताल की सफाई करते हैं। इनकी सैलरी भी 50 हजार से ऊपर है। इससे पहले सेक्टर-6 स्थित एक किराए के कमरे में अस्पताल चलाते थे।

ढाई साल से जयपुर व उदयपुर मोबाइल वैन यूनिट को 8-8 गांवों तक सीमित किया हैω। जुलाई 2015 से ये वैन परीक्षण के तौर पर चल रही हैं। अब 5-10 दिनों में रोज चलाना शुरू कर देंगे। उदयपुर जिला प्रशासन को कई बार भूमि के लिए लिखा, लेकिन सुनवाई नहीं की गई। दो कंपाउंडर मंगलवार को नियुक्त कर िदए हैं। -डॉ. किशन सालवी, होम्योपैथिक चिकित्सालय चमनपुरा के

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