Hindi News »Rajasthan »Jaipur »News» संस्कृति मान्य प्रतीकात्मक मार्गदर्शन है, न कि थोपी हुई ज्ञानात्मक व्यवस्था

संस्कृति मान्य प्रतीकात्मक मार्गदर्शन है, न कि थोपी हुई ज्ञानात्मक व्यवस्था

संस्कृति सार्वजनिक है। संस्कृति आदर्शात्मक है, लेकिन दैविक नहीं है। भारत में कुछ वर्षो से संस्कृति को विशिष्ट...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 04, 2018, 02:50 AM IST

संस्कृति मान्य प्रतीकात्मक मार्गदर्शन है, न कि थोपी हुई ज्ञानात्मक व्यवस्था
संस्कृति सार्वजनिक है। संस्कृति आदर्शात्मक है, लेकिन दैविक नहीं है। भारत में कुछ वर्षो से संस्कृति को विशिष्ट स्वरूप देने के प्रयास हो रहे हैं। संस्कृति का अभियोजन होता है, इसमें सामाजिक भाव निहित होते हैं। संस्कृति में सामाजिक गुमराह के लिये स्थान नहीं होता। वास्तव में संस्कृति लोगों के दिमाग और दिल में है। संस्कृति वास्तविक और चतुर प्रेरणादायक श्रोत है। संस्कृति को आदर्शवादी, भौतिकवादी, व्यवहारवादी, निश्चयात्मकवादी की संज्ञा देना एकपक्षीय समझ होगी। संस्कृति लोगों के द्वारा मान्य प्रतीकात्मक मार्गदर्शन है, न कि एक थोपी हुई ज्ञानात्मक-प्रतीकात्मक व्यवस्था। संस्कृति न तो अनन्त है, और न ही हास्यास्पद। संस्कृति को रोमांचकारी या चुटकला समझना भी नासमझी ही होगी। संस्कृति मानव संवाद का समग्र है, और इसी में एक विशिष्ट संस्कृति का समायोजन होता है। सामान्य और विशिष्ट संस्कृति में किसी भी प्रकार का विरोधाभास नही है। संस्कृति कल्पित नही है, बल्कि लोगों के स्वयं द्वारा की गई व्याख्या है। यह आवश्यक है कि संस्कृति को प्रकृति प्रतिनिधित्वकारी व वास्तविक/यथार्थवादी होनी चाहिये। चूंंकि संस्कृति के केन्द्र में गतिशील मनुष्य है, संस्कृति स्थिर प्रघटना नहीं हो सकती। मनुष्य को मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति और उनके निमित साधनों के बारे में गम्भीर मार्ग संस्कृति द्वारा निर्देशित किये जाते हैं। प्रथा, परम्परा, रितीरिवाज, विरासत आदि की आड़ में संस्कृति को एक खास अर्थ देकर लोगों को नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है। इस सन्दर्भ में, हमारे शास्त्रीय ज्ञान के श्रोतों की दुहाई देकर लोगों को गुमराह किया जा रहा है। हमारे ग्रंथों की इस प्रकार की व्याख्या पूर्णतः गलत व जनहित के विरूद्ध है। उत्तर प्रदेश में ’लव जिहाद’ के नाम पर लाखों वयस्क नवयुवकों व नवयुवतियों को दंड़ित किया गया। उनको चेतावनी दी गई, और मुकदमें दर्ज किये गये। लोगों के निजी जीवन में हस्तक्षेप संविधान का हनन है। स्व-नियुक्त तथाकथित नैतिकता के ठेकेदार बने कतिपय लोग खुले घूम रहे हैं। शासन का उनको भय बिल्कुल भी नही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों और चेतावनी के बावजूद, ऐसे लोग ’रोमियों’ लोगों की धरपकड़ कर रहे हैं, जैसे ये लोग अपराधी हैं, और नैतिकता के ठेकेदार, देश की पुलिस है। ’एन्टी-रोमियों स्क्वाड़’ के विचार व क्रियान्विति में शासन की प्रत्यक्ष रूप में सक्रिय भूमिका रही है। यह कैसी संस्कृति है? वयस्क लोगों को अपने जीवन के बारे में निर्णय करने का अधिकार है। किसी अन्य को सांस्कृतिक ढ़कोसले के माध्यम से किसी व्यक्ति के निजी जीवन में हस्तक्षेत्र करने का अधिकार नही है। संस्कृति की आड़ में, जाति, धर्म, गोरक्षा आदि को मुद्दे बना कर नये प्रतिमान थोपने का सिलसिला चल रहा है। देश के संविधान व न्यायालयों के निर्णयों की अनदेखी हो रही है। शासन इन मुद्दों पर चुप्पी साधे हुये है। ऐसा क्यौं हो रहा है? इस प्रश्न का एक स्पष्ट उत्तर तो यह हो सकता है कि इस नये संस्कृतिवाद द्वारा एक वृहद वोट-बैंक तैयार किया जा सकता है। निरपेक्षवाद भी अर्थविहीन हो जाता है। क्या भारत के भविष्य व भावी पीढ़ी के लिये ऐसा संस्कृतिवाद हितकारी सिद्ध होगा? ऐसी नीति-रीति का एक दुष्परिणाम यह है कि सम्प्रदाय के नाम पर ’समावेश’ और अलगाव की प्रवृति को प्रोत्साहन प्राप्त हो रहा है। समावेशित आर्थिक वृद्धि/ विकास की प्रक्रिया को सबसे अधिक आघात हो रहा है। वंचित वर्गो को राज्य की योजनाओं का उचित लाभ भी नही मिल रहा है। मीडिया में रोजाना सुनने व पढ़ने में आता है कि चयनित लोगों का प्रभुत्व है, और उन्हीं की पब्लिक साधनों तक पहुॅंच है। अमरते सैन ने समावेशित वृद्धि/विकास को अमली स्वरूप देने के लिये संरचनात्मक धरातलीय सुधार की आवश्यकता जताई है। इस सन्दर्भ में तीन बातों पर ध्यान देना होगाः (1) साधनों तक पहुॅंच, (2) साधनों तक पहुॅंचने के लिये वृहद्ध तरीके व उपायों का प्रावधान, और (3) साधनों को उपलब्ध करवाने का औचित्य। यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो समावेशित विकास के ध्येय को ही न केवल प्राप्त करेंगे, समावेशित प्रजातन्त्र को भी अधिक मजबूत बनायेंगे। प्रश्न यह है कि क्या हम ’समावेशित राजनीति’ को प्रोत्साहित नही कर सकते? इस प्रकार की राजनीति में जाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्रियता आदि जैसे चर गौण रहेंगे, और समता और न्याय पर आधारित राजनैतिक संस्कृति हमारे प्रजातन्त्र का आधार बन सकेगी। (लेखक : प्रो-चांसलर, जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी, जयपुर व पूर्व कुलपति, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर हैैं)

प्रो. केएल शर्मा

दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | अब पाइए Jaipur News in Hindi सबसे पहले दैनिक भास्कर पर | Hindi Samachar अपने मोबाइल पर पढ़ने के लिए डाउनलोड करें Hindi News App, या फिर 2G नेटवर्क के लिए हमारा Dainik Bhaskar Lite App.
Web Title: संस्कृति मान्य प्रतीकात्मक मार्गदर्शन है, न कि थोपी हुई ज्ञानात्मक व्यवस्था
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

More From News

    Trending

    Live Hindi News

    0

    कुछ ख़बरें रच देती हैं इतिहास। ऐसी खबरों को सबसे पहले जानने के लिए
    Allow पर क्लिक करें।

    ×