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इस किले पर है एशिया की सबसे तोप, एक बार चली तो गोले से बन गया तालाब / इस किले पर है एशिया की सबसे तोप, एक बार चली तो गोले से बन गया तालाब

जयपुर में जयगढ़ किले पर रखी यह तोप एशिया में सबसे बड़ी तोप मानी जाती है।

dainikbhaskar.com

Sep 22, 2015, 12:21 AM IST
(जयगढ़ किले में रखी एशिया की सबसे बड़ी मानी जाने वाली तोप जिसके चलाने पर बन गया था तालाब।) (जयगढ़ किले में रखी एशिया की सबसे बड़ी मानी जाने वाली तोप जिसके चलाने पर बन गया था तालाब।)
जयपुर. जयपुर में जयगढ़ किले पर रखी यह तोप एशिया में सबसे बड़ी तोप मानी जाती है। इसके साइज का अंदाजा इसी बात से लगाया जाता है कि इसके गोले से शहर से 35 किलोमीटर दूर एक गांव में तालाब बन गया था। आज भी यह तालाब मौजूद है और गांव के लोगों की प्यास बुझा रहा है। अरावली की पहाड़ियों पर बना जयगढ़ दुर्ग का निर्माण 1726 में हुआ था।
31 फीट लंबी है तोप की नली, 50 टन का है वजन
विश्व की सबसे बड़ी यह तोप जयगढ़ किले के डूंगर दरवाजे पर रखी है। तोप की नली से लेकर अंतिम छोर की लंबाई 31 फीट 3 इंच है। जब जयबाण तोप को पहली बार टेस्ट-फायरिंग के लिए चलाया गया था तो जयपुर से करीब 35 किमी दूर स्थित चाकसू नामक कस्बे में गोला गिरने से एक तालाब बन गया था। इस तोप का वजन 50 टन है। इस तोप में 8 मीटर लंबे बैरल रखने की सुविधा है। यह दुनिया भर में पाई जाने वाली तोपों के बीच सबसे ज्‍यादा प्रसिद्ध तोप है।
100 किलो गन पाउडर से चलती थी तोप
35 किलोमीटर तक मार करने वाले इस तोप को एक बार फायर करने के लिए 100 किलो गन पाउडर की जरूरत होती थी। अधिक वजन के कारण इसे किले से बाहर नहीं ले जाया गया और न ही कभी युद्ध में इसका इस्तेमाल किया गया था।
आगे की स्लाइड्स में पढ़ें इस किले की रोचक कहानी
27 सितम्बर को वर्ल्ड टूरिज्म डे मनाया जा रहा है। इस मौके पर dainikbhaskar.com ऐसी जगहों के बारे में बता रहा है जो टूरिज्म के लिहाज से लोकप्रिय हैं। आज की कड़ी में हम एक ऐसे किले के बारे में बता रहे हैं जिसके अंदर खुफिया सुरंगें हैं और साथ ही, बता रहे हैं इस किले से जुड़ी कुछ रोचक बातें ...
जयगढ़ के इस किले की दीवार पर रखकर चलाई गई थी तोप। जयगढ़ के इस किले की दीवार पर रखकर चलाई गई थी तोप।
ऊंट की पीठ पर बांधी जाने वाली तोप

किले की रक्षा में तैनात ताकतवर और भारी तोपों का तभी इस्तेमाल होता था, जब कोई दुश्मन हमला करे। दूसरे राज्य पर हमला करने  के लिए इन भारी-भरकम तोपों को युद्ध भूमि तक ले जाना काफी कठिन था। इसी दौर में छोटे और हल्की तोपें बनाई गईं। इन तोपों को हाथी या ऊंट की पीठ पर बांधा जा सकता था। जयगढ़ के किले में रखी गई इस छोटी तोप को भी ऊंट की पीठ पर बांध कर चलाया जाता था। 
तोप के गोले का वजन 50 किलो तक होता था। तोप के गोले का वजन 50 किलो तक होता था।
पहले तोप से फेंके जाते थे पत्थर
 
शुरुआत में तोपों का इस्तेमाल पत्थरों को फेंकने के लिए किया जाता था। ये तोपें पहले तांबे और कांसे की बनीं फिर लोहे की बनने लगीं। 15वीं शताब्दी में तोपें 30 इंच परिधि की होती थीं और 1,200 से 1,500 पाउंड भार के पत्थर के गोले चलाती थीं। लोहे की तोपें आने के बाद लोगों ने देखा की पत्थर की जगह लोहे के गोले से ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा सकता है। इसके बाद तोपों में लोहे के गोलों का इस्तेमाल किया जाने लगा और बैरल का व्यास कम हो गया।
किले की दीवारें 3 किमी में फैली हैं। किले की दीवारें 3 किमी में फैली हैं।
3 किमी. में फैली हैं इस किले की दीवारें
इस किले के दो एंट्री गेट है जिन्‍हें दूंगर दरवाजा और अवानी दरवाजा कहा जाता है। किले में स्थित सागर तालाब में पानी को इकट्ठा करने की उचित व्‍यवस्‍था है। किले का निर्माण, सेना की सेवा के उदेश्‍य से किया गया था जिसकी दीवारें लगभग 3 किमी. के क्षेत्र में फैली हुई है। किले के सबसे ऊंचे प्‍वाइंट पर दीया बुर्ज है जो लगभग सात मंजिला है, यहां से पूरे शहर का मनोरम दृश्‍य दिखाई पड़ता है।
किला के ऊपर बना गार्डन। किला के ऊपर बना गार्डन।
जयपुर का सबसे ऊंचा किला
 
जयगढ़ किला जयपुर का सबसे ऊंचा दुर्ग है। यह नाहरगढ़ की सबसे ऊंची पहाड़ी चीलटिब्बा पर स्थित है। इस किले से जयपुर के चारों ओर नजर रखी जा सकती थी। यहां रखी दुनिया की सबसे विशाल तोप भी लगभग 50 किमी तक वार करने में सक्षम थी। यह भी कहा जाता है कि महाराजा सवाई जयसिंह जब मुगल सेना के सेनापति थे तब उन्हें लूट का बड़ा हिस्सा मिलता था। उस धन को वे जयगढ़ में छुपाया करते थे। इस दुर्ग में धन गड़ा होने की संभावना के चलते कई बार इसे खोदा भी गया।
आमेर किले से जयगढ़ किले तक जानी वाली सुरंग। जिसे अब खोल दिया गया है। आमेर किले से जयगढ़ किले तक जानी वाली सुरंग। जिसे अब खोल दिया गया है।
जयगढ़ और आमेर महल के बीच सुरंग
 
हाल ही में आमेर महल के कुछ भागों का नवीनीकरण किया गया। इसमें सबसे खास था आमेर महल से जयगढ़ जाने वाली सुरंग का तलाश कर फिर से गमन करने योग्य बनाना। जयगढ किले तक इस सुरंग की लंबाई लगभग 600 मीटर है। इस सुरंग से आमेर महल से जयगढ़ जाना बहुत आसान हो गया है। 
 
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जयगढ़ फोर्ट। जयगढ़ फोर्ट।
जयगढ़ फोर्ट के अंदर का नजारा। जयगढ़ फोर्ट के अंदर का नजारा।
जयगढ़ के परकोटे से ली गई फोटो। जयगढ़ के परकोटे से ली गई फोटो।
किले की चारदीवारी। किले की चारदीवारी।
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(जयगढ़ किले में रखी एशिया की सबसे बड़ी मानी जाने वाली तोप जिसके चलाने पर बन गया था तालाब।)(जयगढ़ किले में रखी एशिया की सबसे बड़ी मानी जाने वाली तोप जिसके चलाने पर बन गया था तालाब।)
जयगढ़ के इस किले की दीवार पर रखकर चलाई गई थी तोप।जयगढ़ के इस किले की दीवार पर रखकर चलाई गई थी तोप।
तोप के गोले का वजन 50 किलो तक होता था।तोप के गोले का वजन 50 किलो तक होता था।
किले की दीवारें 3 किमी में फैली हैं।किले की दीवारें 3 किमी में फैली हैं।
किला के ऊपर बना गार्डन।किला के ऊपर बना गार्डन।
आमेर किले से जयगढ़ किले तक जानी वाली सुरंग। जिसे अब खोल दिया गया है।आमेर किले से जयगढ़ किले तक जानी वाली सुरंग। जिसे अब खोल दिया गया है।
जयगढ़ फोर्ट।जयगढ़ फोर्ट।
जयगढ़ फोर्ट के अंदर का नजारा।जयगढ़ फोर्ट के अंदर का नजारा।
जयगढ़ के परकोटे से ली गई फोटो।जयगढ़ के परकोटे से ली गई फोटो।
किले की चारदीवारी।किले की चारदीवारी।
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