--Advertisement--

अनूठा मंदिरः माता को लगता है ढाई प्याला मदिरा का भोग, पुजारी आंख बंद कर उनसे प्रसाद ग्रहण करने का आग्रह करता है, कुछ ही क्षण में गायब हो जाती है मदिरा

राजस्थान के रियांबड़ी क्षेत्र में भंवाल गांव में इनका प्राचीन मंदिर बना है।

Dainik Bhaskar

Oct 13, 2018, 09:35 PM IST

मनीष व्यास/रामकिशोर सोनी| रियांबड़ी/जसनगर. ये हैं भंवाल माता। रियांबड़ी क्षेत्र में भंवाल गांव में इनका प्राचीन मंदिर बना है। खास बात यह है कि इन्हें लड्डू, पेड़े या बर्फी का ही नहीं, मदिरा का भी भोग लगता है और वह भी ढाई प्याले। जी हां, सुनने में यह थोड़ा अजीब जरूर लगता है लेकिन यह सच है। हालांकि हर किसी का भोग नहीं लगता। इस मंदिर से एक और बात जुड़ी है। वह यह है कि 800 साल पुराने इस मंदिर को किसी धर्मात्मा या सज्जन ने नहीं, कुछ डाकुओं ने बनवाया था। यहां 800 साल पुरानी परंपरा के अनुसार- भंवाल माता के मंदिर में माता भक्तों से ढाई प्याले मदिरा का भोग लेती हैं। माता के ढाई प्याले मदिरा भोग का ये चमत्कार आज 800 सालों बाद 21वीं सदी में भी आस्था का एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है।

आंख बंद कर पुजारी करता है प्रसाद ग्रहण करने का अनुरोध...

इस मंदिर में बाकायदा मदिरा को प्रसाद की तरह चढ़ाया जाता है। माता ढाई प्याला मदिरा ही ग्रहण करती हैं। मदिरा से भरा चांदी का प्याला देवी के सामने करके पुजारी आंखें बंद कर उनसे प्रसाद ग्रहण करने का आग्रह करता है। कुछ ही क्षणों में प्याले से मदिरा गायब हो जाती है। ऐसा 3 बार किया जाता है। तीसरी बार प्याला आधा भरा रह जाता है। खास बात ये है कि माता उसी भक्त की मदिरा का भोग लेती है, जिसकी मनोकामना या मन्नतें पूरी होनी होती है और वह सच्चे दिल से भोग लगाता है। इस दौरान यहां देश-विदेश से आने वाले आमो-खास लोग माता को मदिरा का भोग लगते देख हैरान रह जाते है।

दंतकथा : राजा की सेना ने घेरा तो माता ने डाकुओं को भेड़-बकरियों के झुंड में बदला


स्थानीय बुजुर्ग बताते है कि यहां प्रचलित दंतकथा के अनुसार, इस स्थान पर डाकुओं के एक दल को राजा की फौज ने घेर लिया था। मृत्यु को निकट देख उन्होंने मां को याद किया। मां ने अपने प्रताप से डाकुओं को भेड़-बकरी के झुंड में बदल दिया। इस प्रकार डाकुओं के प्राण बच गए और उन्होंने यहां मंदिर का निर्माण करवाया।

इनकी है मनाही : मंदिर परिसर में तंबाकू, बीड़ी-सिगरेट ले जाना भी है मना


यहां माता को प्रसाद चढ़ा रहे भक्त के पास बीड़ी, सिगरेट, जर्दा, तंबाकू व चमड़े का बेल्ट, चमड़े का पर्स आदि वस्तु पास में हो तो माता मदिरा का प्रसाद ग्रहण नहीं करती है। वहीं मंदिर में इन दिनों श्रद्धालुओं के अलावा बड़ी संख्या में विधानसभा चुनावों के लिए दावेदार भी यहां पहुंच रहे है।

धर्मशालाएं है आवास के लिए
स्थापना : मंदिर में शिलालेख के अनुसार मंदिर निर्माण वि.सं. 1119 में हुआ था। मंदिर प्राचीन हिन्दू स्थापत्य कला के अनुसार तराशे गए पत्थरों को आपस में जोड़ कर बनाया गया। स्थानीय दंतकथाओं के अनुसार भंवाल मां प्राचीन समय में यहां एक पेड़ के नीचे पृथ्वी से स्वयं प्रकट हुईं।

temple temple
temple temple
temple temple
X
templetemple
templetemple
templetemple
Bhaskar Whatsapp

Recommended